Moral Story in Hindi – गुरु की सेवा – Moral Story

गुरु की सेवा – Moral Story in Hindi | Moral Story

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पुराने समय में अब जैसे विद्यालय नहीं थे । विद्यार्थी गुरुओं के आश्रम में जाकर विद्या प्राप्त करते थे ।

आश्रम में कोई शुल्क नहीं लगता था । इसके विपरीत, विद्यार्थियों का सारा खर्चा आश्रम ही उठाता था ।

आश्रम नगरों से दूर होते थे । सभी विद्यार्थी आश्रम में रहते थे । गुरु उन्हें वेद और शास्त्र पढ़ाया करते थे । उनके साथ उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या भी दिया करते थे ।

नियम के अनुसार वे इसका अभ्यास वहीं आसपास जंगल में करते थे । विद्या में निपुण होने के बाद विद्यार्थी अपने घर लौटते थे ।

आश्रम में गुरु की सेवा करना विद्यार्थियों का पहला धर्म था । वे हर कार्य गुरु की आज्ञा पाकर ही करते थे । आश्रम का खर्च चलाने के लिए विद्यार्थी गण भिक्षा लेने भी जाते थे । राजाओं के भी लड़कों को भी आश्रम के नियम मानने पड़ते थे । खाना पकाने के लिए ईंधन, सब्जी और अन्न लाना, उगाना आदि सभी कार्य गुरु के आदेश के अनुसार के जाते थे ।

ऐसा ही आश्रम धौम्य ऋषि का था । आश्रम बहुत बड़ा था । सभी विद्यार्थी अपने-अपने कार्य को बड़े ही अच्छे ढंग से करते थे ।

एक दिन बड़े जोर से बादल गरजे, बिजली चमकी और संध्या होते होते मूसलाधार वर्षा होने लगी। सभी विद्यार्थी जैसे-तैसे आश्रम में लौट आए ।

गुरु की आज्ञा अनुसार भोजन कर सभी शयन के लिए चल दिये ।

लगभग आधी रात के समय गुरु जी ने आश्रम का निरीक्षण किया । सभी विद्यार्थी गहरी नींद में सोए थे ।

पर, एक विद्यार्थी-आरुणि-आश्रम से नदारद था ।

यह देख गुरु जी चिंतित हुए ।

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खोज-खबर के लिए उन्होंने अन्य विद्यार्थियों को जगाया ।

वे भी आरुणि नामक उस विद्यार्थी के विषय में कुछ नहीं बता पाए ।

इन दिनों आरुणि को धान के एक खेत की सुरक्षा का भार दिया गया था ।

गुरुजी वर्षा रुकने तक प्रतीक्षा करते रहे ।

वर्षा रुकी ।

कुछ विद्यार्थियों को लेकर गुरुजी जंगल की ओर चल पड़े ।

जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए उन्होंने हाथों में मसाले ले रखी थी ।

जल्दी ही वे सभी धान के खेत पर पहुंच गये | वहां पहुंचते सभी आश्चर्यचकित रह गये ।

उन्होंने देखा कि खेत के चारों ओर बनी मेढ़ एक स्थान से टूटी है व आरुणी उस स्थान पर लेटा है ।

गुरु जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया । बोले – “बेटा ! आश्रम में सूचना तो दे देते । में और विधार्थी को भेजकर मेढ़ ठीक करा देता…।”

आरुणि ने हाथ जोड़कर कहा – “गुरु जी ! वर्षा बहुत तेज थी, यदि मैं आश्रम जाता, तब तक वर्षा के कारण सभी पौधे नष्ट हो जाते, फिर मुझसे ज्यादा आश्रम के खेत महत्वपूर्ण है ।”

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यह सुनकर गुरुजी की आंखें डब-डबा आई ।

उन्होंने आरुणि को बाजुओं में भींच  लिया । पास खङे अन्य विद्यार्थियों की भी आंखे भर आई ।

शिक्षा – “ गुरु सेवा बहुत बड़ी सेवा होती है । गुरु की सेवा करके जो आत्म संतोष मिलता है, उसका आनंद बस वही बच्चे लगा सकते हैं, जो सच्चे मन से गुरु सेवा करते हैं । धन्य है “आरुणि” नामक वह विद्यार्थी जिसने गुरु आदेश पर अपना जीवन संकट में डाल दिया । वह गुरु आज्ञा से पीछे नही हटा था ।”

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Written by lokhindi
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