गद्दार राजा – Moral Story in Hindi – Hindi Kahani

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Moral Story in Hindi

गंगा नदी के तट पर बसे एक राज्य में देव कुमार नामक एक राजा राज्य करता था | उसके स्वपन कुमार नामक एक राजकुमार था | प्रजा स्वपन कुमार से बहुत दु:खी थी |

एक दिन स्नान करने की इच्छा से राजकुमार अपने बहुत से सेवकों को लेकर गंगा नदी के किनारे पहुंचा | जिस समय उसके सेवक उसको स्नान करवा रहे थे | उसी समय वहां बहुत तेज तूफान आया, अवसर पाकर नौकरों ने आपस में सलाह की इस दुष्ट राजकुमार को नदी में डुबोकर मार दिया जाए! तो सदा के लिए पाप कट जायेगा |

वे कुमार को नदी की बहती धारा में धक्का देकर महल वापस लौट आए | राजा ने जब राजकुमार के विषय में पूछा तो वह बोले – ” राजकुमार! नदी में तैर रहे थे | बादल देखकर शायद वे नदी में डुबकी लगाकर, दूसरे किनारे निकल गए | अंधकार में वे हमें नजर नहीं आए |”

राजा ने आज्ञा दी – ” नदी के किनारे-किनारे कुमार की खोज करो और जाल डालकर भी पता लगाओ |” सब और खोजने के पश्चात भी राजकुमार का कहीं पता नहीं चला |

इधर राजकुमार बहता हुआ दूर निकल आया | उसे एक सूखा काठ बहता हुआ मिला, उसने इस सूखे काठ को पकड़ लिया | उसी के सहारे बहता रहा, उस नदी के किनारे पर एक सांप और एक चूहा अपने बिलों में रहते थे | पूर्वजन्म में वे दोनों कंजूस सेठ थे, और उन्होंने अपना रुपया जोड़कर गाढ़ा था | उन्हीं गड्ढों की यह इस जन्म में सांप तथा चूहा बनकर रक्षा करने लगे थे | बाढ़ आने पर इनके बिलों में पानी भर गया और लहरें इन्हें नदी में बहा लाई | प्राण बचाने के लिए इन दोनों ने भी उसी सूखे काठ पर आकर आश्रय लिया | उसी नदी के किनारे एक सेमल का वृक्ष था | पानी ने उसे जड़ से उखाड़ कर गिरा दिया था, उस सम्मेलन वृक्ष पर एक तोता रहता था | उसके पंख भीग गए थे | वह उड़ने की स्थिति में नहीं था, पंख फड़फड़ा कर वह भी इस बहते हुए काठ पर चढ़ गया |

उस सूखे काठ पर बैठे हुए यह चारों प्राणी बहते-बहते एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां नदी के तट पर एक तेजस्वी कुटिया बनाकर रहते थे | उन्हें उन चारों पर दया आ गई, और वह उन्हें बचाने के लिए नदी में कूद पड़े |

वे तैरते हुए उस काठ तक पहुंचे और अपनी बलिष्ट भूझाओ से उसे धकेलकर किनारे पर ले आए | उन्होंने राजकुमार को उठाकर किनारे पर बिठाया और सर्प आदि को कुट्टी में लाकर आग के पास तपने के लिए बैठा दिया | इसके पश्चात राजकुमार के शरीर को सेक कर उसे भी भला-चंगा कर दिया | पहले उन्होंने सर्प आदि को भोजन दिया, इसके बाद राजकुमार को फल-फूल लाकर दिए |

राजकुमार को यह बात बहुत ही बुरी लगी, कि यह तपस्वी इन पशु-पक्षियों को मुझसे अधिक महत्व दे रहा है | उसने सोचा कि मैं इस तपस्वी से इस बात का बदला अवश्य ही लूंगा |

एक-दो दिन बाद जब बाढ़ समाप्त हो गई तो सांप तपस्वी को प्रणाम करते हुए बोला – ” महाशय! आपने मुझे जीवनदान दिया है, मैं तो इस परोपकार का बदला चुका चाहता हूं, मेरे बिल के पास बहुत सा-सोना दबा पड़ा है| मैं वह सब आपको अर्पण करता हूं, जब भी आपको धन की आवश्यकता हो | आप उस स्थान पर जाकर “मणि” कहकर पुकारना |” इतना कहकर सांप वहां से चला गया |

चूहे ने भी उस प्रकार की अपनी कृतज्ञता प्रकट की और बोला – ” देव! मेरे पास भी एक बहुत बड़ा खजाना है | आपको जब भी धन की आवश्यकता हो, उस स्थान पर जाकर “मंडू” कहकर पुकारना |”

तोता भी हाथ जोड़कर बोला – ” हे दयालु मानव! मेरे पास धन तो नहीं है; किंतु आपको अगर कभी लाल रंग की शाली (धान) की आवश्यकता हो तो, मेरे निवास स्थान पर आकर “शुक” कहकर आवाज दीजिएगा |”

किंतु स्वभाव से दुष्ट राजकुमार अपने जीवन दाता को भी कष्ट देने की बात सोचता हुआ, ऊपर से मीठी बात बना कर बोला – ” स्वामी जी! मेरे राजा होने पर आप अवश्य पधारिएगा | मैं सब प्रकार से आप का सत्कार करूंगा |”

सभी लोग अपने-अपने घर चले गए | घर पहुंचने पर राजकुमार को ज्ञात हुआ, कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है | और अब वही गद्दी का वारिस है |

Moral Story in Hindi

कुछ वर्ष यूं ही बीत गए | एक दिन तपस्वी ने सोचा की चलकर उन सभी की परीक्षा ली जाये | जिनके उसने प्राण बचाए थे | सबसे पहले वह सांप के बिल के पास पहुंचा और “मणि” कहकर पुकारा | सांप पहली आवाज में बाहर आया और तपस्वी को प्रणाम किया | वह बोला – ” प्रभु! सोना मेरे बिल में है | आप चल कर ले लें |”

” अभी तो यहीं रहने दो लौटते समय विचार करूंगा |” इस प्रकार कहकर तपस्वी “मंडू” के निवास पर पहुंचा | चूहे ने भी सांप की तरह अपना पूरा धन लेने का तपस्वी से अनुरोध किया | “फिर लौटते समय सोच लूंगा |” इतना कहकर वह तपस्वी “शुक” के पास पहुंचा | तपस्वी की आवाज पहचान शुक तुरंत पेड़ से नीचे उतरा और प्रणाम करके बोला – ” देव ! क्या मैं अपने संबंधियों को भेजकर, हिमालय में उत्पन्न होने वाली शाली मंगवा लू |”

तपस्वी बोला की – ” आवश्यकता होने पर कहूंगा |” दूसरे दिन वह राजा की परीक्षा लेने के विचार से भिक्षा मांगते हुए नगर में घुसा |

उस समय राजा एक सुसज्जित हाथी पर बैठा हुआ, नगर की सैर कर रहा था | उसने तपस्वी को दूर से ही देखा तो वह उसे तुरंत पहचान गया वह सोचने लगा लगता है, कि यह मेरे यहां खाने-पीने तथा कुछ मांगने आया है | इससे पूर्व कि यह मेरे ऊपर किए गए उपकार की पूरी सभा में उल्लेख करें | मुझे इसको पहले ही मरवा देना चाहिए | उसने अपने सैनिकों को बुलाया और कहा – ” मालूम होता है! कि यह कोई ढोंगी साधु है, जो कि बुरे इरादों से यहां आया है | तुम इसकी मुश्के, कसकर पीटते हुए ! नगर से बाहर मारने के स्थान पर ले जाकर, इसका सिर काट डालो |”

राजा की आज्ञा पाकर सैनिक तपस्वी को मारते हुए और घसीटते हुए ले चले तो वह “हे भगवान” ! “हाय मां” कहकर बार-बार यही कहता – ” बुद्धिमानों ने ठीक ही कहा है! कि किसी डूबते हुए आदमी को पानी से निकालने की बजाय लकड़ी को निकालना अच्छा है |”

उन सैनिकों में एक पंडित भी था | उसने उत्सुकतावश पूछा – “हे तपस्वी ! क्या तुमने हमारे राजा पर कोई उपकार किया था |”

तपस्वी ने उन्हें सारी घटना कह सुनाई |

तपस्वी की बात सुनकर वहां मौजूद लोग सोचने लगे “यह मित्र- घातक राजा जीवन दान देने वाले एक तपस्वी के साथ जब इस प्रकार बुरा व्यवहार करके पाप कमा रहा है | तब भला हमारे राज्य की उन्नति किस प्रकार हो सकती है | इससे तो राज्य का अमंगल होगा | इसलिए ऐसे राजा का तो अंत ही कर देना चाहिए |” ऐसा सोचकर उस दुष्ट राजा की प्रजा विद्रोह पर उतारू हो गई और सब ने मिलकर राजा पर हमला बोल दिया | तीर-तलवार और पत्थरों से उसे मारकर हाथी से नीचे गिरा दिया और उसकी लाश उठाकर नदी में फेंक दी | फिर सब ने मिलकर तपस्वी को गद्दी पर बैठा दिया |

वह धर्मपूर्वक राज्य करने लगा | एक दिन फिर परीक्षा लेने की इच्छा से वह अपने साथियों को लेकर सर्प के निवास पर पहुंचा | सर्प ने उसे प्रणाम करके सारा धन उसे सौंप दिया | फिर वह “मंडू” के पास पहुंचा | यहां भी उसने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा खजाना तपस्वी के हवाले कर दिया | इसके पश्चात सभी लोग मिलकर “शुक” के निवास पर पहुंचे | शुक ने अपने उपकारी को आया देख उसे प्रणाम करके पूछा – ” देव! शाली मंगवा लू |”

” जब आवश्यकता होगी तब मंगवा लेंगे, अभी आओ साथ चलो |” इस प्रकार सर्प, चूहे तथा तोते और करोड़ों के खजाने को साथ लेकर तपस्वी अपने राज्य लौट आया |”

यहां उसने सर्प को रहने के लिए एक सुंदर बाग में सुंदर बांबी, चूहे के लिए उसी बाग में बिल तथा तोते के लिए एक बढ़िया बरगद के पेड़ का प्रबंध किया |

इस प्रकार अपनी प्रजा का पालन करते हुए और दानपुण्य तथा धर्म में लगे रहकर तपस्वी ने अनेकों वर्षों तक राज्य किया |

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Written by lokhindi
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