Moral Stories in Hindi – सच्चाई का मार्ग – Moral Stories

सच्चाई का मार्ग – Moral Stories in Hindi | Moral Stories

Moral Stories For Kids / Short Moral Stories | Moral Stories in Hindi

प्राचीन समय में एक ब्राह्मण था । वह बड़ा ही धार्मिक और संस्कारवान प्रवृर्ती का आदमी था । उसके एक छोटा बेटा था । वह अपने बाप से उल्टी प्रवृत्ति का व्यक्ति था । वह शराब, जुआ, चोरी, डाका आदी कार्यों में कुख्यात हो चुका था ।

पिता उसे रोज समझाता, किंतु वह हमेशा टाल जाता । इसके विपरीत, वह अपने दुष्कर्मों में और अधिक ध्यान लगाने लगा ।

आखिरकार एक दिन ब्राह्मण ने उसे अपने घर से निकाल दिया । वह क्रुद्ध होकर चोरी करने निकल पड़ा ।

वह एक किसान की घर में कूद गया । रात का समय था । पूरा गांव गहरी निंद्रा में सोया पड़ा था । अंतः उसे किसान के घर में कूदने में कोई परेशान नहीं हुई ।

वह धीरे-धीरे एक कमरे का ताला तोड़कर अंदर घुस गया । अंदर घुसकर वह अंधेरे में ही किसान की पत्नी के आभूषण तलाशने लगा ।

अंधेरा अधिक होने का उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा था ।

उसी समय कुछ लोग उसी किसान की घर के पिछवाड़े में सेंध लगाने की इरादे से पहुंच गए ।

संयोगवश वे लोग उसी कमरे में सेंध लगा रहे थे जिस कमरे में ब्राह्मण का लड़का चोरी के इरादे से घुस गया था ।

जल्द ही वे लोग सेंध लगाकर अंदर पहुंच गये । उनके हाथों में टॉर्चे थी ।

जैसे ही उनकी एक आदमी ने टॉर्च जलाई, उसका प्रकाश सीधा ब्राह्मण के लड़के पर पड़ा ।

प्रकाश डालने वाला व्यक्ति चीखते-चीखते रुक गया

उधर अपने चेहरे पर प्रकाश पडते ही ब्राह्मण का लड़का घबरा गया कि उसे देख लिया गया है ।

लेकिन वह अपने काम में पक्का था, अंतः फौरन बचाव के लिए अंधेरे में छलांग लगाकर एक संदूक के पीछे छुप गया ।

जबकि उधर अपनी टोर्च को बंदकर वह व्यक्ति अपने साथियों से फुसफुसाया- “साथियों, इस कमरे में कोई और भी है, मुझे लगता है अपना कोई भाई ही है ।”

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“हां, मुझे भी ही लगता है ।” किसी ने उसकी बात का समर्थन किया ।

“चलो, उससे बात करते हैं।”  किसी अन्य ने कहा ।

“मगर उसके पास कोई हथियार…।” अन्य किसी की आवाज उभरी ।

“हथियार तो हमारे पास भी हैं और हमारी संख्या भी ज्यादा है ।” उसी टॉर्च वाले ने कहा ।

“ठीक है चलो, उससे बात करें  ।”

और वे कमरे में ब्राह्मण के लड़के को खोजने लगे |

उधर ब्राह्मण का लड़का संदूक के पीछे छिपा उनकी बातें सुन रहा था | वह समझ गया कि वे उसी की धंधे के भाई बंधु हैं ।

वह बाहर आ गया ।

..उन सभी की निगाह उस पर पड़ी ।

टोर्च वाला धीरे से उसके पास आया – ”बोला तुम यहां चोरी करने आए हो ?”

ब्राह्मण का लड़का खामोश रहा  ।

वहीं टोर्च वाला पुनः बोला – “देखो भाई, हम भी तुम्हारे ही भाई हैं । हम भी उसी इरादे से यहां आए हैं, जिस इरादे से तुम आए हो । मगर मुझे लगता है कि तुम अकेले हो इस काम को कर रहे हो ।

“हां- मैं अकेला ही इस काम को कर रहा हूं ।”  ब्राह्मण का लड़का फुसफुसाया ।

“हमारा पूरा गिरोह है, तुम चाहो तो इसमें शामिल हो जाओ…।”

टॉर्च वाले की बात सुनकर ब्राह्मण का लड़का कुछ सोचने लगा, फिर बोला – “ठीक है, मैं तैयार हूं ।”

घटना के बाद वह उन डाकुओं में मिल गया ।

.. जैसे ही यह लोग चोरी करके चलने लगे, घर के मालिक ने देख लिया, लेकिन उससे पहले की वह शोर मचाता, ब्राह्मण के लड़के ने उसके सीने में छुरा घोंप दिया ।

वह बेचारा चीख भी न सका और ढेर हो गया ।

और फिर !

इस गिरोह में रहकर उसने कितनी हत्याए की, कितनी ही चोरियां, डाके डाले । वह हत्या करने में इतना माहिर गया कि कुछ ही समय में उसे ‘दृढ़ प्रहारी’ का संबोधन दे दिया गया ।

गांव-गांव, गली-गली मे उसके नाम का आंतक फैल गया ।

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उसी प्रकार एक दिन उसने अपने साथियों सहित एक बड़े नगर को लूटा ।

खूब धन बटोरकर वह एक ब्राह्मण के घर ठहर गया । ब्राह्मणी ने खीर बनाई थी । बच्चे खीर खाने को मचल रहे थे ।

दृढ़ प्रहारी को भी खिर बहुत पसंद थी । वह सबसे पहले खीर लेकर खाने लगा ।

यह देखकर ब्राह्मणी को गुस्सा आ गया । उसने कहा – “तुम्हें कुछ तो समझ होनी चाहिए – अभी तो बच्चों ने भी नहीं खाई ।”

इतना सुनते ही दृढ़ प्रहारी को ताव आ गया । उसने ब्राह्मणी को वहीं ढेर कर दिया । ब्राह्मण ने अपनी ब्राह्मणी को आपत्ति में देखा तो वह दृढ़ प्रहारी की ओर दौड़ा । किंतु दृढ़ प्रहारी के एक ही वार में उसकी जान ले ली ।

अपने मालिक की दुर्दशा देखकर उसकी गाय भी उसे बचाने के लिए आगे बढ़ी । परन्तु दृढ़ प्रहारी ने उसे भी ठंडा कर दिया ।

संयोगवश गाय गर्भवती थी । उसके मरते ही उसका बच्चा बाहर निकल आया और तड़पने लगा ।

दृढ़ प्रहारी अपने प्रहार कि तरह ही दृढ़ हृदय का था ।

लेकिन उस गाय के बच्चे को देखते ही उसका हृदय पसीज गया ।

उसने अपनी आंखों के सामने अंधेरा-सा छाता महसूस होने लगा ।

उसका मन उसे धिक्कारने लगा- ‘ ओह ! गाय जैसे निरीह प्राणी को भी मैंने मार डाला । उस गाय को जिसे सबने माता का पद दे रखा है, उस गाय को जो पशु होकर भी अपने मालिक की रक्षा करने के लिए अपने प्राण हथेली पर रखकर मुझ पर आक्रमण करने आगे आ गयी,और…..और मैंने उसे मार डाला ।उफ्! इंसान होकर मुझसे इतना भी विवेक नहीं है…।’

दु:ख में डूबा वह वन की ओर चल दिया ।

तभी उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि जहां उसने नगर लुटे हैं, वहीं लोगों का वध किया है, अंतः उसे वही जाना चाहिए, क्योंकि वहीं पर वह अपने पापो का प्रयश्चित कर सकता है । यह सोचकर वह नगर की ओर चल पड़ा ।

सभी कष्टों को सहकर वह नगर के द्वार पर ही समाधि लगाकर साधना में लीन हो गया ।

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नगर के लोगों ने यह देखा तो अपना संयम खो बैठे । हर मनुष्य के मन मैं उससे बदला लेने की भावना जाग उठी । बच्चे-बच्चे ने उससे अपना बदला चुकाया ।

उसे खूब सताया । पत्थरों से मारा । लेकिन व खामोशी से सब कुछ सहता रहा, उसके मुंह से आह तक न निकली और न ही वह अपने मार्ग से जरा भी विचलित हुआ ।

जिस प्रकार वह लूटपाट कुति में कुशल दृढ़ था, उसी प्रकार उसने मुनिवृति में भी दृढ़ता का खूबी से परिचय दिया ।

किसी को भी पल भर में माल डालने की कला में निपुण दृढ़ प्रहारी ने अपने कर्मों का भोज उतारने में भी घोर पराक्रम दिखाया ।

और अंत में,

जब लोगों का क्रोध शांत हो गया तो सभी की आंखें आश्चर्य के कारण फट पङी । उन्होंने देखा कि दृढ़ प्रहारी के शरीर पर अनेकों स्थानों से खून की धाराए बह रही है, लेकिन उसके मुख पर वेदना का एक भी बल नहीं है ।

सभी समझ गई की दृढ़ प्रहारी अपने पश्चाताप में सफल खो गया है और वे खुद इतना नीचे गिर गए हैं कि उठना चाहते हुए भी नहीं उठ सकते ।

अगले ही पल वहां मौजूद सभी लोग दृढ़ प्रहारी के कदमों में गिर पड़े । सभी के मुंह से एक साथ निकला -‘ दृढ़ प्रहारी! हमें माफ कर दो ।

दृढ़ प्रहारी ने सिद्ध कर दिया था कि वह सचमुच एक ब्राह्मण का बेटा है । सभी लोगों के मुंह से ऐसा वाक्य सुनते ही उसने आंखें खोली और बोला- “उठो लोगों ! यह सब तो मनुष्य प्रवृति है ।

और फिर दृढ़ प्रहारी ने सच्चाई का मार्ग अपना लिया । अब उसकी प्रवृत्ति बदल चुकी थी ।

शिक्षा – “ कभी-कभी छोटी से छोटी घटना कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति का मन बदल देती है । जैसा कि दृढ़ प्रहारी के साथ हुआ । बुराई हर हाल में बुराई होती है । बुराई के रास्ते से बचकर निकलना और अच्छाई के रास्ते को अपनाना ही सच्ची मनुष्यता है ।”

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Written by lokhindi
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