महाराणा प्रताप History – Maharana Pratap Biography Hindi

महाराणा प्रताप History

– महाराणा प्रताप का इतिहास / Maharana Pratap in Hindi। महाराणा प्रताप का जीवन परिचय – महाराणा प्रताप की History और कहानी हिंदी में !  


मुगल बादशाह अकबर ने कन्धार से अहमदनगर तक का प्रदेश जीत लिया था; किंतु मेवाड़ के सामने उसकी एक नहीं चली। महाराणा प्रताप ने हिंदू धर्म के गौरव एवं राजपूत-स्वाधीनता की ध्वजा को वहाँ सदा ऊँचा रखा।

सन् 1540 ई० में राणा प्रताप का जन्म हुआ था। बचपन से उनमें अद्भुत शौर्य था। वे प्रायः महाराणा कुम्भा के विजय स्तम्भ की परिक्रमा करके मेवाड़ की पवित्र धूलि उठाकर सिर से लगाते और देश को स्वाधीन करने की प्रतिज्ञा करते थे।

बहुत-से राजपूत राजाओं ने अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध जोड़ लिये थे। इसी कारण अकबर के सेनापति राजा मानसिंह जब मेवाड़ पहुँचे तो राणा प्रताप ने उनके साथ बैठकर भोजन करना स्वीकार नहीं किया। मानसिंह क्रोध में भरे दिल्ली पहुंचे। मानसिंह और युवराज सलीम के सेनापतित्व में बड़ी भारी शाही सेना ने मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी।

महाराणा प्रताप History

हल्दीघाटी नाम के स्थान पर महाराणा ने इस सेना का मार्ग रोका। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। कुल तीन हजार राजपूत सैनिक विशाल शाही सेना से जूझ पड़े। राजपूतों की शूरता के सामने मुगल-सेना के छक्के छूट गये। लेकिन राजपूत बहुत थोड़े थे। स्वयं महाराणा बहुत घायल हो चुके थे। उन्हें युद्ध से हटना पड़ा। अपनी सेना के साथ वे अरावली के जंगलों में चले गये।

मेवाड़ के महाराणा अपनी रानी, पुत्र और कन्या के साथ वन-वन भटकने को विवश हुए। न भोजनका ठिकाना, न रहने को स्थान। पर्वत की गुफाओं में भी टिक कर नहीं रह पाते थे। प्रायः स्थान बदलना पड़ता था। घास को पीसकर उसकी रोटी बनती और वह भी कभी-कभी तो आधे पेट ही मिल पाती। अकबर केवल अधीनता स्वीकार कर लेने मात्र से महाराणा को अपना प्रधान सेनापति बनाने को तैयार था। लेकिन महाराणा को पराधीनता की अपेक्षा मृत्यु भी सुखकर जान पड़ती थी। उपवास करते-करते उनकी पुत्री मरने लगी, पर वे अपने व्रत पर दृढ़ रहे।

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इसी समय मेवाड़ के अर्थमन्त्री भामाशाह ने अपने पूर्वजों की एकत्र की हुई सब सम्पत्ति मह्मराणा के चरणों में अर्पित कर दी। उस धन से सेना एकत्र करके राणा प्रताप ने अनेक किलों को अकबर से छीन लिया और उदयपुर को राजधानी बनाकर राज्य करने लगे।

राणा ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि चित्तौड़ का उद्धार किये बिना वे धातु के बर्तन में भोजन नहीं करेंगे और पलंग पर सोयेंगे नहीं। जीवन-पर्यन्त वे पत्तल में भोजन करते रहे। चटाई पर ही वे सोते थे। 29 जनवरी 1597 को उन तेजस्वी ने देह त्याग किया। उनके शौर्य से मेवाड़ की भूमि वीरों के लिये वन्दनीय हो गयी।

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Written by lokhindi
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