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	<title>CHANAKYA NITI &#8211; Lok Hindi</title>
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	<title>CHANAKYA NITI &#8211; Lok Hindi</title>
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		<title>Chanakya Sutra Hindi &#124; चाणक्य सूत्र के कुछ अंश हिंदी में</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Jun 2019 18:46:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>Chanakya Sutra ‘पंडित&#8217; विष्णुगुप्त चाणक्य की नीति के कुछ महत्वपूर्ण अंश “Chanakya sutra hindi” सम्पूर्ण चाणक्य Neeti के सूत्र हिंदी भाषा में! सुख का मूल धर्म: सुख का मूल धर्म है। राजनीति एवं अपने कार्यों का ज्ञान होना ही राजा का सबसे बड़ा धर्म होता है। इसी धर्म से देश में सुख और शान्ति रह सकती है। इसलिए धर्म को ही सुख की मूल जड़ और धर्म कहा गया है। धर्म का मूल अर्थ: धर्म का मूल अर्थ है देश में जब धर्म बना रहे। यह धर्म तभी बना रहेगा जब देश की आर्थिक स्थिति ठीक होगी । यदि देश में राजनीति को ठीक ढंग से चलाना है तो देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करना होगा। जिस देश की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं, उसका धर्म भी सुरक्षित नहीं। अर्थ का मूल रूप: अर्थ का मूल राज्य है। राज्यों में स्थिरता बनी रहे। हर राज्य में शान्ति का वातावरण हो। ऐसा ही देश अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ होता है। राज्य और इन्द्रियां: राज्य का मूल इन्द्रिजय है। राज्य में शान्ति तभी बनी रह सकती है, जब वहां का राजा या सरकार को चलाने वालों की इन्द्रियां उनके वश में हों। वे लोग अपने चरित्र को बनाए रखें। राज्य पर इन्द्रियों का प्रभाव: राज्य कैसे चलाया जाता है? इसका ज्ञान होने पर राजा सत्य को पहचान लेता है। सत्य को जान लेने पर उसका स्वभाव बहुत धैर्यवान और विनम्र हो जाता है। उसके अन्दर से हर बुराई दूर हो जाती है। वह हर मानव से अच्छा व्यवहार करता है। इसे ही तो विनय कहा जाता है, विनयशील राजा ही अपनी इन्द्रियों को वश में रख सकता है। बूढ़ों की सेवा: वृद्धों की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। ज्ञानी पुरुषों के साथ रहकर मनुष्यों को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यही तो ज्ञान होता है। सच्चा ज्ञान: सच्चे ज्ञान से ही राजा अपने को योग्य समझता है। ज्ञानी बुद्धिजीवी पुरुषों की संगति में रहकर ही ज्ञान प्राप्त करे, यही ज्ञानी पुरुष का कर्तव्य है। इससे ही वह राज्य के शासन को चला पाएगा। Chanakya sutra hindi: कर्तव्य- जो राजा अपने कर्तव्य को समझ जाता है, वही अपनी इन्द्रियों को वश में रख सकता है। जो इन्द्रियों को वश में कर ले, वही महाज्ञानी है। जितात्मा: जितात्मा सभी सम्पत्तियों को प्राप्त करता है। जो राजा अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है, उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। उसे धन-सम्पत्ति सब मिलते हैं। सम्पन्न: जो राजा सम्पन्न हो, उसकी प्रजा भी सम्पन्न हो जाती है। राजा की, व्यवस्था यदि सुन्दर हो तो सारे देश को सम्पन्नता प्राप्त हो जाती है। जब देश सम्पन्न होगा तो प्रजा भी सम्पन्न होगी। राज्य कैसे चलता है? प्रजा के सम्पन्न होने पर नेताहीन राज्य भी चलता है। यदि कभी अचानक ही राजा की मृत्यु हो जाए अथवा वह बीमार पड़ जाए और कोई सरकार चलाने वाला न रहे तो जनता के सम्पन्न होने पर ऐसे राज्य को कोई खतरा नहीं रहता। जनता स्वयं ही कोई व्यवस्था कर लेती है। ऐसे राज्य का हर काम शांतिपूर्वक चलता रहता है। यदि प्रजा दु:खी और गरीब होती है तो वह राज्य नष्ट हो जाता है। प्रजा का कोप: प्रजा का कोप सब कोपों से भयंकर होता है। देश की जनता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है। इसलिए राजा को चाहिए कि पहले प्रजा को सुखी रखे। यदि कोई भी राजा प्रजा को दु:खी रखेगा तो प्रजा एक दिन अवश्य विद्रोह कर देगी। ऐसी हालत में राजा को कोई भी नहीं बचा सकेगा। बुरा राजा: राजा बुरा होने से तो राजा न होना ही अच्छा है। निकम्मे राजा से तो जनता कभी सुखी नहीं रहती। यदि बुद्धिहीन और पथभ्रष्ट राजा हो तो उसके बिना भी जनता राज को चला लेगी। योग्यता: जिस देश का राजा स्वयं ही योग्य हो तो ऐसे राजा को अपने सहयोगी भी योग्य ही रखने चाहिए। ताकि योग्य मंत्रियों के साथ मिलकर काम चलाए। सहायकों के बिना राजा कोई निर्णय नहीं कर सकता, इसलिए राजा को सदा योग्य सहायक ही रखने की आवश्यकता है। राज्य शासन: जिस प्रकार एक पहिए से रथ नहीं चल सकता, उसी प्रकार कभी अकेला राजा शासन नहीं चला सकता। उसे अपने लिए मंत्रियों और सहायकों की भी आवश्यकता है। राजा और मंत्री शासन के दो पहिए होते हैं। सच्चा सहायक: जो मन्त्री राजा के सुख-दु:ख में साथ दे, वही सच्चा सहायक होता है। जो दुःख में साथ छोड़कर चला जाए, ऐसे सहायक पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मंत्रणा: जो राजा अपने अच्छे सहयोगियों से मंत्रणा करता है, वह हर कार्य में सफल हो जाता है। जिस व्यक्ति में कोई गुण नहीं, ज्ञान ऐसे व्यक्ति से कभी भी कोई मंत्रणा न करें और न ही उसे राजनीति के गुप्त बात बताएं। मंत्री कौन हो? राजा को चाहिए कि किसी ज्ञानी, बुद्धिमान को ही मंत्री बनाए, जो राजनीति को भी जानता हो। ऐसे प्राणी को मंत्री बनाने से पहले छूप-छुपकर उसकी परीक्षा ले । राजनीति और प्रेम को कभी एक साथ न रखे। प्रेम व्यक्तिगत होता है। राजनीति पूरी प्रजा के साथ चलती है। कहने का अर्थ यह है कि मंत्री सदा राजनीति का ज्ञानी और जनता का सेवक हो। कार्य सिद्धि: सभी कार्य मंत्रणा से ही सिद्ध होते हैं। राजा सदा मंत्रियों की मंत्रणा से चलता है। जिस राजा के मंत्री गुणवान हैं, वह राजा अपनी प्रजा को खुश रखकर अपने कार्य सिद्ध करता है। Chanakya sutra hindi: भेद- प्रमाद से भेद शत्रु को ज्ञात हो जाता है। मंत्रणाओं को गुप्त रखने में थोड़ी-सी भी लापरवाही से राज्य के सारे भेद शत्रु के पास चले जाते हैं। मंत्रणा- मंत्री की रक्षा सभी के द्वारा की जाए। एक देश-दूसरे देश के भेदों को जानने के लिए कई तरह के प्रयत्न करता है। इसलिए जिस द्वार से भी भेद जाने का डर हो, उसी द्वार को पूर्ण रूप से बन्द कर दे। इन भेदों को पूरी तरह से सुरक्षित रखना चाहिए। मंत्र सम्पदा राज्य की उन्नति करती है। मंत्रणाओं की सावधानी से रक्षा करने पर ही देश उन्नति के शिखर पर पहुंचता है। मंत्र की गोपनीयता श्रेष्ठतम कही गई है। मंत्रणा से ही राजा, मन्त्री मिलकर काम करते हैं। इसी से देश की रक्षा भी होती है। इसलिए देश की...</p>
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		<title>चाणक्य नीति: सत्रहवां अध्याय [ हिंदी में ] Chanakya Neeti Hindi</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Jun 2019 16:54:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति: सत्रहवां अध्याय ‘पंडित&#8217; विष्णुगुप्त चाणक्य की विश्व प्रसिद नीति का सत्रहवां भाग हिंदी में। चाणक्य नीति: सत्रहवां अध्याय (Chanakya Neeti Seventeenth Chapter in Hindi) पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ। सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः ।। जिसने गुरु के सान्निध्य में नहीं वरन पुस्तकें पढ़-पढ़कर ही ज्ञान प्राप्त किया है, वह व्यक्ति विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत होता है। जैसे दुराचारिणी स्त्री गर्भधारण करके भी समाज में तिरस्कृत होती है। चाणक्य ने इस श्लोक में गुरु के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए गुरु प्रदत्त ज्ञान को ही श्रेष्ठ बताया है। कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिंसनम् । तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टं समाचरेत् ।। विज्ञान के एक नियम के अनुसार क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चय ही होती है। चाणक्य भी इस मत का समर्थन करते हुए इसी बात को कहते। हैं कि जो जैसा व्यवहार करे, उसके प्रति वैसा ही व्यवहार करने में कोई दोष नहीं है। भाव यह है कि जो भला सोचे, उसके प्रति भला ही सोचना चाहिए। इसके विपरीत जो बुरा सोचे उसके प्रति बुरा सोचने में कोई बुराई नहीं है। यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम् । तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ।। जो वस्तु जितनी अधिक दूर है, उसे उतना ही तप करके प्राप्त करना संभव है। यहां तप का तात्पर्य श्रम से है। इसलिए चाणक्य कहते हैं कि श्रम से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। श्रमशील व्यक्ति असंभव कार्य को भी संभव कर दिखाता है। इसमें संशय नहीं है। लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् । सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः। सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना।। व्यक्ति का सबसे बड़ा अवगुण लोभ है, चुगलखोरी सबसे बड़ा पाप है। यदि व्यक्ति सदाचारी हो, सत्य बोलने वाला हो तो उसे किसी भी प्रकार के तप की आवश्यकता नहीं है। अर्थात सत्य बोलना व सदाचारी होना ही सबसे बड़ा तप है। यदि मन पवित्र हो तो तीर्थ स्नान की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति यशस्वी हो तो उसे अन्य आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती। यशस्वी होना ही सबसे बड़ा आभूषण है। इसी तरह यदि व्यक्ति श्रेष्ठ विद्या धन से युक्त हो तो अन्य किसी प्रकार के धन की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अपकीर्ति व निरादर व्यक्ति के लिए मरण समान है। पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरा। शङ्खो भिक्षाटनं कुर्यान्नाऽदत्तमुपतिष्ठते।। शंख और लक्ष्मी दोनों का पिता समुद्र है। लेकिन भिक्षा मांगने वाले साधु शंख को बजा-बजाकर भीख मांगते हैं। शंख चंद्रमा के समान उज्ज्वल भी है। फिर भी यही समझना चाहिए कि शंख ने संभवत: दान आदि नहीं किया। इसलिए साधुओं-भिक्षुकों के हाथों में शोभा पाकर भीख मांगता है। चाणक्य ने इस श्लोक में दान के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा है कि व्यक्ति को दान-पुण्य अवश्य करते रहना चाहिए। दान से यह लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं। अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः। व्याधिष्ठो देवभक्तश्च वृद्धा नारी पतिव्रता ।। निर्बल व्यक्ति विवश होता है, इसलिए उसका आचरण भी बदल जाता है। जैसे बलहीन व्यक्ति ब्रह्मचारी बन जाता है, धनाभाव के कारण साधु-संन्यासी बन जाता है, बीमारी होने पर ईश्वर भक्त हो जाता है, ठीक इसी प्रकार बुढ़ापे में स्त्री पतिव्रता बन जाती है। लेकिन सामर्थ्य होने पर या बलवान होने पर यदि व्यक्ति ऐसे आचरण करें तो यह उनका महत्त्वपूर्ण गुण माना जाता है। उदाहरणार्थ यदि स्त्री यौवनमयी व सुन्दर होने पर भी पतिव्रत का पालन करती है तो यह उसकी विशिष्टता है। नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिदशी समा। न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातुर्दैवतं परम् ।। अन्न व जल से बढ़कर कोई दान नहीं है। द्वादशी तिथि से बढ़कर कोई तिथि नहीं है। गायत्री मंत्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है तथा माता से बढ़कर कोई देवता नहीं है। तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके। वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम् ।। सपं का विष दांतों में, मक्खी का विष उसके मस्तक में, बिच्छू का विष उसकी पूंछ में होता है। लेकिन दुष्ट व्यक्ति का तो समूचा शरीर ही विष वृक्ष होता है। अर्थात उसके नख-शिख में विष ही विष भरा होता है। इसलिए दुष्ट व्यक्ति का कभी संग नहीं करना चाहिए। पत्युराज्ञां विना नारी झुपोष्य व्रतचारिणी। आयुष्यं हरते पत्युः सा नारी नरकं व्रजेत् ।। जो स्त्री पति की अनुमति के बिना व्रत-उपवास करती है तो वह ऐसा करके उसकी आयु का क्षय करती है और स्वयं नरक में जाती है। अर्थात पत्नी का धर्म पति की आज्ञा का पालन करना व पतिव्रत धर्म को निभाना है। न दानैः शुध्यते नारी नोपवास शतैरपि। न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा ।। पत्नी नाना प्रकार के दान, व्रत-उपवास, तीर्थ सेवन करके भी उतनी पवित्र नहीं होती जितनी पति की सेवा करने से होती है। दानेन पाणिर्न तु कंकणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन । मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन ।। हाथों की शोभा दानादि कर्म करने से है, न कि कंगन आदि आभूषण धारण करने से। इसी प्रकार शरीर शुद्धि स्नान करने से होती है, न कि केवल चंदन लेपने से। मन को संतुष्टि मान-सम्मान से होती है, न कि भरपेट भोजन करने से । कल्याण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से होती है, न कि तिलक लगाने, श्रृंगार करने से। भाव यह है कि व्यक्ति को बाह्याडंबरों से बचकर अंतः शुद्धि के प्रयत्न करने चाहिए। नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्थलेपनम् । आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ।। नाई के घर जाकर हजामत बनवाना, पत्थर की मूर्तियों पर चंदन का लेप लगाना, जल में अपना प्रतिबिंब देखना आदि जितने भी कार्य हैं। उनसे व्यक्ति का वैभव नष्ट होता है। सद्यः प्रज्ञाहरा तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा । सद्यः शक्तिहरा नारी सद्यः शक्तिकरं पयः ।। कुंदरू अर्थात तुंडी का सेवन करने से बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती है। वच का सेवन करने से बुद्धि की वृद्धि होती है। स्त्री शक्ति को शीघ्र हर लेती है तथा दुग्धपान से शीघ्र बल प्राप्ति होती है। परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् । नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे ।। जो व्यक्ति परोपकार की भावना रखता है, उसकी विपदाएं स्वतः नष्ट हो जाती हैं। उसे हर कदम पर सफलता मिलती है। अत: व्यक्ति को परोपकार का भाव अवश्य रखना चाहिए। यदि रामा यदि च रमा अहितनयो विनयगुणोपेतः । यदि तनये तनयोत्पतिः सुखमिन्द्रे किमाधिक्यम् ।। जिस व्यक्ति की...</p>
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		<title>चाणक्य नीति: सोलहवां अध्याय [ हिंदी में ] Chanakya Neeti Hindi</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Jun 2019 20:32:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति: सोलहवां अध्याय ‘पंडित&#8217; विष्णुगुप्त चाणक्य की विश्व प्रसिद नीति का सोलहवां भाग हिंदी में। चाणक्य नीति: सोलहवां अध्याय (Chanakya Neeti Sixteenth Chapter in Hindi) न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धमोऽपि नोपार्जितः । नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नालिङ्गितम्, मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ।। जो प्राणी इस संसार के मोहमाया जाल में फंसे हुए हैं और जो इस जाल से बाहर निकलने के लिए न तो वेदों का पाठ करते, न ईश्वर की उपासना करते हैं। न ही अपने लिए स्वर्ग के द्वार खोलने के लिए धर्मरूपी धन का संग्रह करते, न स्वप्न में स्त्री के सुंदर स्तनों व जंघाओं का आलिंगन करते, वे लोग माता के यौवन रूपी वृक्ष को काटने वाले कुल्हाड़े रूप होते हैं। जल्पन्ति सार्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः। हृदये चिन्तंयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः ।। वेश्याएं बातचीत तो किसी से करती हैं, किन्तु विलासपूर्वक किसी और को देखती हैं तथा उनके मन में भी किसी और का ही चिन्तन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेश्याओं का प्यार किसी एक के साथ नहीं होता। वह सबकी प्यारी होती हैं, मगर उनका असली प्यार तो धन से होता है। यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत् ।। जो मूर्ख अज्ञानी होने के कारण ऐसा समझता है कि यह सुन्दर नारी मुझ से प्रेम करती है। ऐसा आदमी उनके प्रेम जाल में फंसकर कठपुतली की भांति नाचता रहता है। कोऽर्थानं प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को नाम राज्ञां प्रियः। कः कालस्य न गोचरत्वमगमत्कोऽर्थी गतो गौरवं को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पथि।। ऐश्वर्य को पाकर किसे अभिमान नहीं हुआ, किस विषयलोलुप की विपत्ति नष्ट नहीं हुई? इस दुनिया में नारी के रूप से किसका मन बेचैन नहीं हुआ? सत्य में राजा का प्रिय कौन हुआ? मृत्यु के वश में आज तक कौन नहीं हुआ ? किस याचक ने गौरव पाया? पापी के फंदे में फंसकर इस संसार के मार्ग में कुशलता से कौन वापस आया और कौन गया? न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरङ्गः।। तथाऽपि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ।। सोने के हिरण की रचना पहले किसने की जबकि उसने न तो सोने का हिरण देखा ही और न ही उसके बारे में कभी सुना। इस पर भी भगवान श्रीराम उस सोने के हिरण को पकड़ने के लिए व्याकुल हो गए। इसे ही कहते हैं कि जब विनाश का समय आता है, तब मनुष्य की बुद्धि उलटी हो जाती है। वह जो कुछ भी सोचता है वह उल्टा होता है। बुद्धि तो वही होती है किन्तु समय ही बुरा आ जाता है। बुरे समय में कोई भी मनुष्य चाहते हुए भी अच्छा काम नहीं कर सकता। गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थिताः। प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते ।। इन्सान अपने श्रेष्ठ गुणों और अच्छे चरित्र द्वारा ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। ऊंचे आसन पर बैठने से कोई भी पुरुष श्रेष्ठ नहीं बनता। क्या राज भवन की चोटी पर बैठने से कौआ गरुड़ बन सकता है। गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः। पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलङ्को यथा कृशः ।। यह मत भूलो कि हर स्थान पर केवल मनुष्य के गुणों का ही सम्मान होता है। यह गुण ही उसे साधारण प्राणी से अलग करते हैं। बहुत धन को इकट्ठा कर लेने वाले पुरुषों को वह सम्मान नहीं मिलता है, जो गुणवानो को मिलता है। जैसा कि बहुत कम चमक और प्रकाश वाला, जिस पर कोई दाग नहीं होता, द्वितीय का चांद जो हर ओर पूजा जाता है। क्या पूर्णिमा का चांद भी ऐसे ही पूजा जाता है? नहीं, बिल्कुल नहीं। परैरुक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्। इंद्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः ।। जिस मानव के गुणों की प्रशंसा दूसरे लोग उसकी पीठ के पीछे करें, भले ही वह गुणहीन क्यों न हो परन्तु उसे ही गुणवान माना जाएगा, किन्तु यदि इन्द्र भी अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करे तो उसे छोटापन माना जाएगा। विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम् । सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ।। गुणवान को पाकर बुद्धिमान लोग बड़े खुश होते हैं। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न देखने में अत्यन्त सुन्दर लगता है। गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः। अनर्थ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ।। गुणवान पुरुष यदि परमात्मा के समान हो तो भी अकेला होने पर दुःख उठाता है। जैसे बहुत कीमती हीरा भी सोने में जड़े जाने का इंतजार करता है। इसी प्रकार उस गुणवान पुरुष को भी किसी न किसी सहारे की तलाश रहती है। अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु। शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे।। जो भी धन दूसरों को दुःख पहुंचाकर, धर्म का उल्लंघन करके कमाया जाता है। ऐसे धन को कभी भी स्वीकार न करें। यह पाप का धन आपको भी पापी बना देगा। किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला। या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।। उस धन का क्या लाभ जो कुलवधू की भांति केवल एक ही मनुष्य के उपयोग के लिए हो। धन का असली आनन्द तो वही होता है जो की वेश्या की भांति सबको आनन्द दे। धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु। अतृप्ताः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च ।। धन, दैनिक जीवन, नारी सेवन और विविध प्रकार के अन्न सेवन के विषयों में सारे प्राणी प्यासे रहकर ही चले गए, चले जाएंगे और चले जाते हैं। क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोम बलिक्रियाः।। न क्षीयते पात्रदानमभयं सर्वदेहिनाम् ।। अन्न, पानी, कपड़ा, भूमिदान आदि सब प्रकार के दान तथा बह्मयज्ञ, देवयज्ञ आदि सभी समाप्त हो जाते हैं परन्तु सुपात्र को दिया गया दान और प्राणि मात्र को दिया गया अन्नदान कभी भी नष्ट नहीं होते। तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः । वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति।।। इस संसार में तिनके को सबसे हल्का माना जाता है। किन्तु तिनके से भी हल्की रुई होती है और रुई से भी हल्का याचक होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि याचक रुई से भी अधिक हल्का होता है तो उसे हवा उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती ? इसका उत्तर यह है कि यह याचक मुझसे भी कुछ न मांग बैठे। इसी कारण वायु उसे उड़ाकर नहीं ले जाती। वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गे न जीवनात्। प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्ग दिने दिने ।। अपमानित होकर जीने से तो मर जाना अधिक अच्छा है, क्योंकि मरते समय केवल क्षण भर ही तो दु:ख होता है। लेकिन अपमानित होने पर...</p>
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		<title>चाणक्य नीति: पंद्रहवां अध्याय [ हिंदी में ] Chanakya Neeti Hindi</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jun 2019 18:35:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[CHANAKYA NITI]]></category>
		<category><![CDATA[HINDI GYAN]]></category>
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		<category><![CDATA[Chanakya Neeti Fifteenth Chapter]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति: पंद्रहवां अध्याय ‘पंडित&#8217; विष्णुगुप्त चाणक्य की विश्व प्रसिद नीति का पंद्रहवां भाग हिंदी में। चाणक्य नीति: पंद्रहवां अध्याय (Chanakya Neeti Fifteenth Chapter in Hindi) यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु। तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः ।। जिसका मन प्राणिमात्र पर दया करने से खुश हो जाता है उसे ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति की तथा लम्बी-लम्बी जटाएं धारण करने और शरीरं पर राख का लेप करने की क्या जरूरत है? एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेतू। पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा चाऽनृणी भवेत् ।। जो गुरु अपने शिष्यों को अद्वितीय, विनाश रहित ईश्वर की शक्ति का ठीक-ठीक बोध करा देता है, वह ऐसा कोई पदार्थ इस पृथ्वी पर नहीं देखता जिसे शिष्य गुरु के चरणों में अर्पण करके गुरु का ऋण चुका सके। गुरु महान है, उसकी सेवा से आप भी तो महान बन सकते हैं। खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया। उपानन्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम् ।। बुरे आदमी व अज्ञानी से बचने के दो उपाय हैं-या तो जूतों से मुख मर्दन करना अथवा दूर से ही उन्हें देखकर अपनी राह बदल लेना। कुचैलिनं दन्तमलोपसृष्टं बाशिनं निष्ठुरभाषिणं च। सूर्योदये चास्तमिते शयानं विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ।। गन्दे वस्त्र धारण करने वाले, गंदे दांतों वाले, पेटू, कड़वा बोलने वाले तथा सूर्यास्त के समय सोने वाले को शोभा, स्वास्थ्य, सौन्दर्य और ईश्वर त्याग देते हैं, भले ही वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही क्यों न हों। त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च । तं चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः ।। मित्र, स्त्री, सेवक, बन्धुवर-यह सब गरीब इन्सान को त्याग देते हैं। जब वह मनुष्य पुनः धनवान बन जाए तो वही लोग उसके पास भागे आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह धन ही तो इन्सान का सबसे बड़ा दोस्त, मित्र, बन्धु-बांधव है। अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति। प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति ।। पाप और बुरे कर्मों से कमाया हुआ धन दस वर्षों तक ठहरता है और जैसे ही ग्यारहवां वर्ष चालू हो जाता है तो यह मूल समेत नष्ट हो जाता है। अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् । अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शङ्करभूषणम् ।। जो लोग समर्थ हैं, धन वाले हैं, उनके किए गलत काम भी ठीक हो जाते हैं। परन्तु जो लोग निर्धन हैं, छोटे हैं, उनके लिए उचित कार्य भी गलत गिने जाते हैं। उदाहरण के तौर पर दैत्य के लिए अमृत भी मौत का कारण बन जाता है और शिवजी के लिए विष भी अमृत बन जाता है। इसी विष को पीकर वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। तळोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन् । सा प्राज्ञता यो न करोति पापं दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः ।। भोजन उसे ही कहते हैं जो ब्राह्मणों के भोजन कर लेने के पश्चात् किया जाता है। यानी ब्राह्मणों को खिलाने के पश्चात् जो भी भोजन बच जाए उसे करना चाहिए। प्यार वह है जो दूसरों के साथ किया जाए, अपनों से तो सभी प्यार करते हैं। अक्लमन्दी यह है कि प्राणी पापों से सदा दूर रहे और सच्चा धर्म वही है जिसके द्वारा इन्सान पाप, झूठ और बुरे कर्मों से बचा रहे। मणिर्तुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते। क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः ।। हीरा चाहे पांव के नीचे लटकता रहे और कांच को सिर पर रख लिया जाए परन्तु जब आप उसे बेचने के लिए जाएंगे तो हीरे की कीमत ही मिलेगी, कांच को कोई नहीं लेगा। अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता छ। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यातू ।। इस संसार में अनगिनत वेदशास्त्र और बहुत सी विद्याएं हैं। परन्तु दूसरी ओर देखें तो समय भी बहुत कम है। इसलिए इन शास्त्रों के अर्थ को ही समझना चाहिए। जैसे हम दूध और पानी के मिश्रण में से केवल दूध को पी लेते हैं, पानी को छोड़ देते हैं। दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा च गृहमागतम्। अनर्चयित्वा यो भुङ्क्ते स वै चाण्डाल उच्यते ।। दूर से चलकर आने वाले रास्ते की थकान से टूटे हुए लोग यदि बिना स्वार्थ आपके घर चलकर आते हैं तो ऐसे मेहमानों का आपको खुले दिल से आदर-सत्कार करना चाहिए। यदि कोई घर का मालिक ऐसे लोगों को खाना खिलाए बिना स्वयं पहले खा ले तो ऐसे लोगों को पापी एवं चांडाल कहा जाता है। पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ।। जो लोग सारे वेदों और धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने के पश्चात् भी इन शास्त्रों के ज्ञान को नहीं जानते और न ही आत्मा और परमात्मा को जानते हैं, वे आत्मज्ञान से भी वंचित हैं। उन लोगों का जीवन तो ठीक ऐसा है जैसे रसदार शाक में घूमने वाली कलछी को उसके स्वाद का न तो ज्ञान होता है, न आनन्द ही आता है। धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे। तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ।। यह ब्राह्मण रूपी नौका तो धन्य है। संसार रूपी सागर में यह उलटा ही चलती है। यह उलटी क्यों चलती है सुनो, जो इस नाव के नीचे रहते हैं वे सब के सब तो तर जाते हैं, इस सागर से पार हो जाते हैं यानी उनका कल्याण हो जाता है। जो लोग इसके ऊपर बैठते हैं, उनका पतन जाता है। यानी वे इस नौका से नीचे गिर जाते हैं और संसार रूपी सागर में डूब जाते हैं। इसका भावार्थ यह है कि जो लोग ब्राह्मणों के साथ नम्रता से पेश आते हैं, उनकी सेवा करते हैं, वे संसार के बंधनों से मुक्त होकर पार हो जाते हैं। उनका कल्याण हो जाता है और जो लोग ज्ञानरूपी नौका में न चढ़कर पापों की नौका में चढ़ते हैं, जो ब्राह्मणों, ज्ञानियों का सम्मान नहीं करते, उनका कभी कल्याण नहीं होता। वे कभी सुख को प्राप्त नहीं कर सकते।। अयममृतनिधानं नायकोऽप्यौषधीनां अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः। भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ।। चन्द्रमा अमृत का भंडार, औषधियों का अधिपति, अमृतमयी शरीर वाला और कान्तियुक्त होने पर भी जब सूर्य के मंडल में जाता है तो उसका सारा प्रकाश समाप्त हो जाता है, उसकी सारी सुन्दरता मिट जाती है। ठीक इसी तरह किसी दूसरे के घर में जाकर सबकी आनशान खत्म हो जाती है। अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः ।। विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते ।। भंवरा जब कमलिनी के पत्तों के बीच में था, तब कमलिनी के पराग का रस पान कर उसके मद से अलसाया रहता था,...</p>
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		<title>चाणक्य नीति: चौदहवां अध्याय [ हिंदी में ] Chanakya Neeti Hindi</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Jun 2019 10:04:26 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[chanakya neeti]]></category>
		<category><![CDATA[Chanakya Neeti Fourteenth Chapter]]></category>
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		<category><![CDATA[चाणक्य नीति: चौदहवां अध्याय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>चाणक्य नीति: चौदहवां अध्याय ‘पंडित&#8217; विष्णुगुप्त चाणक्य की विश्व प्रसिद नीति का चौदहवां भाग हिंदी में। चाणक्य नीति: चौदहवां अध्याय (Chanakya Neeti Fourteenth Chapter in Hindi) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।। इस धरती पर पानी, अन्न और सूक्तियां, ये तीन ही रत्न प्राणी के लिए हैं। परन्तु जो लोग मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं, वे हर पत्थर के टुकड़ों को हीरा समझते हैं। आत्माऽपराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।। दारिद्रयरोगदुःखानि बन्धनव्यसनानि च ।। चिन्ता, दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन और आपत्तियां, यह सबके सब मनुष्य को घेर लेते हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं किन्तु प्राणी ने कभी यह भी सोचा है कि यह सब इन्सान के अधर्म रूपी वृक्ष से ही तो पैदा होते हैं। यदि मनुष्य चाहे तो अपने मन में आत्मविश्वास की शक्ति पैदा करके इन सबसे मुक्ति पा सकता है। पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः।।। धन, दोस्त, नारी, सम्पत्ति, राज्य । यह सब तो बार-बार मिल सकते हैं परन्तु यह मानव शरीर यदि एक बार चला जाए तो फिर वापस नहीं मिल सकता। बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः। वर्षाधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ।। यदि मनुष्य मिल-जुलकर, एक होकर शत्रु का मुकाबला करें तो शत्रु को पराजित कर सकते हैं। जैसे भारी वर्षा में तिनके छप्पर की शक्ल में इकट्ठे होकर वर्षा के पानी को रोक लेते हैं। जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि। प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः ।। पानी में तेल और पापी आदमी से गुप्त रहस्य, सत्पात्र को दिया गया दान, बुद्धिमान को दिया गया शास्त्र ज्ञान, यह सब थोड़े होने पर भी वस्तु की शक्ति से स्वयं ही विस्तार को प्राप्त होते हैं। धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्। सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेतू को न मुच्येत बन्धनातू ।। धर्म, ज्ञान, कथा सुनने के समय, श्मशान भूमि में और रोगी होने पर इन्सान में जो बुद्धि प्राप्त होती है, यदि ऐसी बुद्धि इन्सान की सदा ही रहे तो इस संसार के बन्धनों से छुटकारा मिल सकता है। उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी। तादृशी यदि पूर्वं स्यात् कंस्य न स्यान्महोदयः ।। बुरे कर्म करने के पश्चात् पश्चाताप करने वाले प्राणी को जैसे बुद्धि प्राप्त होती है, यदि वैसी ही बुद्धि उसे पाप करने से पहले मिल जाए तो किसका कल्याण नहीं होगा? दाने, तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ।। दान देने की मनोवृत्ति, उपासना, बहादुरी, विज्ञान, विनम्रता और नितिता में सबसे बड़ा होने का अभिमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि इस संसार में दानवीरों की कोई कमी नहीं है। इस धरती पर एक से बढ़कर एक दानी, उपासक, बहादुर और बुद्धिमान भरे पड़े हैं। किसी से किसी की तुलना कैसी ? दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः । यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ।। जो भी जिसके मन में बसा हुआ है, वह तो दूर रहते हुए भी उससे दूर नहीं है और जो जिसके हृदय में समाया हुआ है, वह अत्यन्त निकट रहने पर भी दूर नहीं रहता। यस्य चाप्रियमिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम् । व्याथो मृगवथं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ।। जिसका भी अप्रिय करने की इच्छा हो उससे सदा मीठी वाणी बोलकर पेश आना चाहिए। जैसे शिकारी हिरन का शिकार करने से पहले मधुर स्वरों में गीत गाता है और जब गीतों को सुनकर हिरन मस्ती में झूमता हुआ, नाचता हुआ उस जालिम शिकारी की ओर खिंचा चला आता है तब शिकारी उसे आकर पकड़ लेता है। अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः । सेवितव्यं मध्यभागेन राजा वह्निर्गुरुः स्त्रियः ।। राजा, आग, गुरु और स्त्री। इन सबका सेवन मध्य अवस्था में करना चाहिए। क्योंकि यह सब अत्यन्त निकट होने पर भी विनाश का कारण बन जाते हैं। अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पा राजकुलानि च। नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षटू ।।। आग, पानी, स्त्री, सांप और राज परिवार। इन सबसे सदा होशियार रहना चाहिए। क्योंकि जरा-सी भूल के कारण यह प्राणों को नष्ट कर देते हैं। स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्मः स जीवति। गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ।। इस संसार में केवल बुद्धिमानों का जीवन ही असली जीवन है और धर्मात्मा लोगों का जीवन यथार्थ होता है। जो भी लोग धर्म और अर्थ से अनजान हैं, उनका जीवन बिल्कुल व्यर्थ है। यदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा। परापवादसस्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ।। हे प्राणी ! यदि तुम एक ही कर्म से इस संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो दूसरों की निन्दा में लगी अपनी वाणी को रोको। अर्थात् निन्दा करना छोड़ो।। प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः ।। जो भी प्राणी प्रसंग के अनुकूल बात करना जानता है, जो अपनी बुद्धि की गरिमा के अनुकूल मधुर भाषा में बात करने के गुण रखता है, जो अपनी शक्ति को देखकर क्रोध करता है, उसी प्राणी को हम विद्वान और पंडित मानते हैं। एक एवं पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः। कुणपः कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः ।। नारी तो एक ही प्रकार की होती है परन्तु उसी शरीर को तीन प्रकार के लोग अलग-अलग रूपों में अपनी-अपनी नजरों से देखते हैं। योगी-उसे अतिनिन्दित शव के रूप में देखता है। कामी पुरुष-उसे सुन्दर नारी के रूप में देखता है। कुत्ता–उसे मांस के टुकड़े के रूप में देखता है। इसे कहते हैं- जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि । सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम् । कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ।। विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह विष में सिद्ध की गई औषधि, धर्माचरण, घर के दोष, स्त्री संभौग, कुभोजन और लोगों से सुने बुरे शब्दों को कभी भी प्रकाशित न होने दे। तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः । यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक्प्रवर्तते ।। जब तक प्राणियों को आनन्द देने वाली वसंत ऋतु आरम्भ नहीं हो जाती तब तक बेचारी कोयल अपने को मौन रखकर अपना दिल बहलाती है। केवल बसंत ऋतु के आने पर ही कोयल की रस भरी सुरीली आवाज सुनाई देती है। धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् । सुगृहीतं च कर्तव्यमन्यथा तु न जीवति ।। धर्म, धन, अन्न और गुरु का ज्ञान व औषधियों का भलीभांति संग्रह करने वाले लोग बुद्धिमान होते हैं और जो लोग इन सबका संग्रह नहीं करते वे कभी सुख से जी नहीं सकते। त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम् ।। &#8216;हे प्राणी ! तुम दुष्टों का साथ छोड़कर अच्छे-भले ज्ञानी...</p>
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