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	<title>STORIES &#8211; Lok Hindi</title>
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		<title>14 Best Business tips in Hindi for Success</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Aug 2019 12:30:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>Business Tips in Hindi व्यवसाय के सन्दर्भ में सफलता हेतु कुछ आवश्यक तत्त्व Best 14 Business tips in Hindi for Success and new Ideas for success in business field. विशेषतया व्यवसाय के सन्दर्भ में!  आज के इस वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक समय में किसी व्यवसाय की सफलता (Business success) न केवल बहुत-से साधनों की उपलब्धता पर निर्भर करती है, बल्कि बहुत कुछ मानवीय गुणों, चारित्रिक विशेषता, स्वभाव एवं कुई मनोवैज्ञानिक कारणों पर भी निर्भर करती है। &#8211; इसी पर आधारित कुछ आवश्यक तत्त्व Business tips in Hindi and Business Ideas जो व्यवसाय के सन्दर्भ में सफलता हेतु आवश्यक है। Here are the Best 14 Business tips in hindi that make you successful in your field&#8230; व्यवसाय (Business) की पूर्ण जानकारी: Tips देखा गया है कि कई व्यक्ति लोगों की देखा-देखी, कोई भी व्यवसाय शुरू कर देते हैं, लेकिन वह उस व्यवसाय की आर्थिक उपादेयता (Economic Viability) का सही आकलन नहीं करता है। जो सामान वह बनाने जा रहा है। या जो व्यवसाय वह शुरू कर रहा है, उसकी बिक्री की क्या व्यवस्था, कुशल-अकुशल श्रमिकों की उपलब्धता तथा जिस जगह आप व्यवसाय को शुरू कर रहे हैं, उस व्यवसाय में अन्य कितने लोग संलग्न हैं, इस तरह की विस्तृत जानकारी बिना एकत्र करे यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय शुरू करता है, तो उस व्यवसाय की सफलता के बारे में कुछ भी कहना सम्भव नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में एक विशेष प्रकार की यूनिट सफल हो गई तो देखा जाता है कि उस क्षेत्र में वैसी ही बहुत सारी यूनिट्स साल-दो साल में लग जाती हैं, जिनमें से एक-दो के अतिरिक्त सभी असफल होकर कुछ वर्षों में बन्द हो जाती हैं। कई बार इस तरह की छोटी-छोटी यूनिट्स के बन्द होने के कारण, एक बड़ी यूनिट का लगना भी होता है, लेकिन आपको इन सब बिन्दुओं पर, यूनिट लगाने से पूर्व विस्तृत रूप से ध्यान देना होगा। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए, उस क्षेत्र की जितनी अधिक जानकारी आप जुटा सकेंगे, वह आपके हर निर्णय को सही एवं सटीक बनाने में मददगार होगी। व्यवसाय में संलग्न विभिन्न क्षेत्रों में आपस में समन्वय स्थापित करना: सभी व्यक्ति समान नहीं होते हैं। एक व्यक्ति में कुछ गुण होते हैं तो दूसरे व्यक्ति में अन्य प्रकार के गुण होते हैं। कोई व्यक्ति मार्केटिंग में अच्छी दक्षता रखता है तो दूसरा व्यक्ति प्रशासनिक कार्यों में अच्छी पैठ रखता है, अन्य व्यक्ति संवाद में श्रेष्ठ हैं तथा एक व्यक्ति अकाउण्ट्स में श्रेष्ठता रखता है। जब हम कोई व्यवसाय/प्रोजेक्ट शुरू करते हैं तो हमें हर क्षेत्र के व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे कुशल व्यक्तियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ यह बहुत आवश्यक है कि आप उनमें आपस में अच्छा तालमेल बैठा सकें। आपका हर व्यक्ति से मधुर सम्बन्ध हो। आपका दायित्व है कि हर व्यक्ति को अच्छा कार्य करने हेतु प्रेरित करना एवं उनसे अधिकतम कार्य कुशलतापूर्वक पूर्ण करवाना। सफलता के लिए, कार्यों का सही आकलन एवं विभिन्न विभाग के व्यक्तियों में आपस में तालमेल एवं समन्वय स्थापित रखना, बहुत आवश्यक है। ऐसा करने से आप जिस किसी व्यवसाय में भी कदम रख रहे हैं, उसमें आर्थिक उपादेयता (Economic Viability) बढ़ती है एवं व्यवसाय सुचारु रूप से चलता है। किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए, उस व्यवसाय में संलग्न व्यक्तियों में मधुर सम्बन्ध, आपस में समन्वय, उनमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है एवं साथ ही कार्य के प्रति, उस व्यवसाय के प्रति लगाव, समर्पण बढ़ता है। किसी भी व्यवसाय की सफलता वस्तुतः उस व्यवसाय में संलग्न विभिन्न व्यक्तियों के समग्र प्रयासों का सुपरिणाम है। सहकर्मियों के अच्छे कार्यों की प्रशंसा: हर व्यक्ति को अपनी प्रशंसा अच्छी लगती है। कोई आपके स्वभाव की, आपके व्यवहार की, आपके कार्यों की प्रशंसा करता है तो आपको कितना अच्छा लगता है? प्रशंसा से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है, वह सम्मानित महसूस करता है, वह आपके प्रति अधिक वफादार होता है एवं वह कार्य के प्रति अधिक समर्पित होता है। उसके मन में आपके प्रति अधिक सम्मान का भाव जाग्रत होता है। अधिकांश लोग, स्वयं की तारीफ सुनना तो पसंद करते हैं, लेकिन स्वयं दूसरों की तारीफ करने में बड़े कंजूस होते हैं। किसी भी व्यवसाय में संलग्न सहकर्मियों का कार्य के प्रति समर्पण होना, उस व्यवसाय की सफलता की अनिवार्य आवश्यकता है। आप मशीन की तरह मनुष्य को बटन दबाकर, कम या ज़्यादा गति से नहीं चला सकते। उनका दिल से सहयोग प्राप्त करने के लिए, उनके कार्यों की प्रशंसा करना, उनके सुख-दुःख में काम आना, उनके प्रति विनम्र व्यवहार, उनकी भावनाओं की कद्र करना, ऐसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं, जो किसी भी व्यवसाय/व्यक्ति की सफलता में बहुत अहम् भूमिका अदा करते हैं। तारीफ करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जिस व्यक्ति की तारीफ की जा रही है उसे ऐसा प्रतीत न हो कि आप उसका मज़ाक बना रहे हो या उसकी झूठी तारीफ कर रहे हो। आप पूरी गम्भीरता से, सच्चे मन से तारीफ करें। यदि कोई ऐसी नीति हो कि व्यक्ति के अच्छे कार्य हेतु कोई पुरस्कार भी दिया जा सके तो इस तरह की नीति को लागू करना भी आपको सफल बनाने में मददगार होगा। ‘‘इन्तज़ार करने वालों को सिर्फ उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं।” &#8211;अब्दुल कलाम सहकर्मियों के साथ संवाद: प्रशासन का एक नियम यह भी है कि व्यक्ति का अपने सहकर्मियों के साथ संवाद बना रहे। किसी सहकर्मी को, किसी अधीनस्थ कर्मचारी को कोई समस्या हो, कोई कहीं गलती नज़र आए, कोई ऐसी बात दिखाई दे जो व्यवसाय के हितों के विपरीत हो, तो वह उस बात को अपने अधिकारी को तुरन्त बताए एवं हिचकिचाए नहीं। यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है। बोसिज्म (Bossism) एक बड़े उद्योग में तो सम्भव है या सरकारी उपक्रम में सम्भव है, लेकिन सहकर्मियों का दिल जीतने के लिए आवश्यक है कि आपका उनसे संवाद बना रहे। आपको अपने सहकर्मियों के दुःख-सुख का पता हो, आप उनकी खुशियों में सम्मिलित हों, उनके दु:ख में उनके साथ हों। ये सब, तब ही सम्भव है, जब आपका उनके साथ संवाद (Communication) सही रूप में बना रहे। किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए, संवादहीनता बहुत ही घातक होती है। संवादहीनता से गलतफहमियाँ पैदा होती हैं। व्यक्ति मात्र एक मशीन की तरह...</p>
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		<title>Motivational thoughts in Hindi &#8211; प्रेरक विचार हिंदी में</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Aug 2019 16:52:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>Motivational Thoughts in Hindi Best Motivational thoughts in Hindi for students / जीवन में सफल होने हेतु सबसे अच्छे प्रेरक विचार हिंदी में, ज़िन्दगी में आगे बढ़ने हेतु या उन्नति के लिए Motivational thoughts (प्रेरक विचार) जो आपकी जीत के प्रमुख पड़ावों को पार करने में आपकी मदद करेंगे!   लक्ष्य निर्धारण &#8211; Motivational Thoughts in Hindi बिना लक्ष्य निर्धारण के व्यक्ति इधर-उधर भटकता रहता है, जब तक आपको यह पता नहीं है कि आपकी मंजिल क्या है? आप क्या प्राप्त करना चाहते हैं? आपकी आकांक्षा क्या है? तब तक आप द्वारा की गई कोशिश, बिना दिशा ज्ञान के चलने वाली नौका के समान है। ऐसी नौका का नाविक बस पतवार चलाता रहता है। वह कहाँ पहुँच गया या वापस वहीं आ गया, जहाँ से चला था, इसका उसे कुछ पता ही नहीं रहता। अपना लक्ष्य तय करने के बाद से ही व्यक्ति उस लक्ष्य प्राप्ति हेतु गम्भीरता से प्रयास करने लगता है। अनेक व्यक्ति अपने सामने बहुत बड़ा लक्ष्य रखकर, उस लक्ष्य प्राप्ति हेतु पूरी लगन एवं निष्ठा से स्वयं को झोंक देते हैं। इनमें से कई व्यक्ति अपने लक्ष्य की प्राप्ति भी कर लेते हैं, जबकि कुछ असफल भी हो जाते हैं। हमारा मानना है कि यदि सम्भव हो, तो अन्तिम बडे लक्ष्य की अपेक्षा छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित कर लेने चाहिए। मान लो आप किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दो वर्ष देना चाहते हैं, तो आप अपने लिए 6-6 माह के लिए लक्ष्य निर्धारित कर लें और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में आने वाली समस्याओं एवं कठिनाइयों का स्वयं आकलन करें, समीक्षा करें। अपने प्रयासों का विश्लेषण, समीक्षा और अपनी कमियों का ज्ञान अगले लक्ष्य की प्राप्ति में अत्यधिक मददगार होता है। एक बात का और भी ध्यान रखें। यह एक व्यावहारिक बात है कि लक्ष्य, आपकी योग्यता, क्षमता के अनुरूप हो, इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपनी योग्यता, क्षमता में वृद्धि नहीं कर सकते। अपनी योग्यता, क्षमता में वृद्धि निश्चित रूप से की जा सकती है, लेकिन इस हेतु जिन साधनों की आवश्यकता है, उनके सन्दर्भ में निर्णय करें। एक और महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि जितना बड़ा आपका लक्ष्य होगा, आपको उतनी ही अधिक मेहनत करनी होगी। बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किया गया प्रयास भी उतना ही वृहत् होना चाहिए। लक्ष्य निर्धारण करने के बाद ही आप उस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अपनी योग्यता और क्षमता को एक निश्चित दिशा में प्रयुक्त करना शुरू करते हैं। लक्ष्य निर्धारण से आपको एक निश्चित दिशा में कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। लक्ष्य निर्धारण से तात्पर्य यह है कि आप में उस लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास है। लक्ष्य निर्धारण करने के बाद ही आप आत्मविश्लेषण कर, स्वयं को उस लक्ष्य प्राप्ति हेतु तैयार करते हैं और स्वयं को अनुशासित कर, लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होते हैं। लक्ष्य निर्धारण के बाद आप योजना बनाकर बहुत समझदारी से, मेहनत से लगन एवं निष्ठा से उस लक्ष्य को प्राप्त करने में जुट जाते हैं। लक्ष्य की प्राप्ति से आपका आत्मविश्वास बढ़ता है, स्वयं के प्रति सम्मान बढ़ता है, स्वयं की क्षमता एवं योग्यता पर विश्वास बनता है। आप में और अधिक संघर्ष करने की लौ जागती है। अत: लक्ष्य निर्धारण बहुत महत्त्वपूर्ण है, यह जीत की राह का अहम् पड़ाव है। संघर्ष का दौर- Motivational Thoughts in Hindi लक्ष्य तय करने के बाद, शुरू होता है आपका संघर्ष का दौर। आपने जो मंजिल तय की है, उसे प्राप्त करने हेतु आप अपनी पूर्ण शक्ति और लगन के साथ जुट जाते हैं। यह वह दौर है, जिसमें व्यक्ति स्वयं की योग्यता एवं क्षमता का आकलन करता है। यह ऐसा दौर होता है, जिसमें व्यक्ति स्वयं की इच्छाशक्ति, अपनी मेहनत करने की क्षमता एवं स्वयं के गुणों को ऑकता है। इस दौर में व्यक्ति को स्वयं की कमियों तथा अक्षमताओं का ज्ञान होता है। होता यह है कि व्यक्ति जोश-जोश में लक्ष्य निर्धारित कर लेता है। वह बहुत उत्साह एवं उल्लास से सोच लेता है कि वह इस लक्ष्य को तो हर परिस्थिति में प्राप्त करके ही रहेगा, लेकिन जब संघर्ष का दौर और स्वयं की कुव्वत को ऑकने का मौका आता है, तो पता चलता है कि वह कहाँ पर है, जिस कार्य को वह बहुत आसान समझता था, वही उसे बहुत कठिन जान पड़ता है। कुछ व्यक्ति संघर्ष के दौर में शुरू के कुछ दिनों में बहुत अनुशासन में, बहुत गम्भीरता से प्रयास करते हुए देखे जाते हैं, लेकिन बाद में वे बिल्कुल ढीले हो जाते हैं एवं निष्क्रिय होकर, अपने लक्ष्य प्राप्ति अभियान से उन्मुख होकर, उदासीन से बैठ जाते हैं। यह कठिनाइयों और समस्याओं से मुकाबला करने का दौर है। इस दौर में बहुत आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसा दौर है, जब आपको बहुत अनुशासित रहकर, धैर्यपूर्वक, पूर्ण लगन एवं निष्ठा से परिश्रम करते हुए शनैः-शनै: अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ना है। इस दौर में आने वाली कठिनाइयों से घबराना नहीं है। आपको सकारात्मक दृष्टिकोण से आशावादी होकर आगे बढ़ना है। छोटी-मोटी असफलताएँ आपको विचलित न कर दें, इसका ध्यान रखें। विजय पथ पर, कई बार पराजय होती है, लेकिन जो पराजित होकर बैठ गया, वह कभी विजेता नहीं बन सकता है। असफलताओं से सीखें एवं अपनी कमियों को दूर करें। पुनः प्रयास करें। सफल होंगे ही। यह संघर्ष का दौर एक कसौटी है, जिसमें आप स्वयं को परखते हैं, स्वयं को आँच में तपाते हैं एवं स्वयं में निखार लाते हैं। यह दौर स्वयं को बेहतर बनाने का, स्वयं को निखारने का, स्वयं को परखने का एवं आत्मविश्लेषण का शानदार दौर है। जीत का दौर &#8211; Motivational Thoughts in Hindi यह वह समय है, जब आप निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर चुके होते हैं, इस दौर में आप हर्ष, उल्लास, आत्मविश्वास से भरे होते हैं। आप स्वयं की योग्यता/क्षमता पर नाज कर रहे होते हैं। यह दौर विजेता की तरह खुश होने का, गर्व करने का है। जीवन में जीत दर्ज करना एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है, जो आकस्मिक नहीं मिलता, इसके लिए बहुत त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। व्यक्ति को अपनी जीत का जश्न अवश्य मनाना चाहिए। जश्न मनाने का अर्थ, सार्वजनिक रूप से किसी पार्टी आदि से...</p>
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		<title>प्यार में धोखा &#8211; प्रेम और धोखे की हिंदी (दास्तान) कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 16:03:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[LOVE STORIES HINDI]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्यार में धोखा हिंदी कहानी प्यार में धोखा हिंदी कहानी / Pyar me dhokha Hindi Kahani (Betrayal In Love) &#8211; प्रेम और धोखे की हिंदी दास्तान (तोता-मैना किस्सा) राजेश अपने पिता सेठ मोहन लाल का इकलौता बेटा था। मोहन लाल के पास बेशुमार दौलत थी। राजेश पर आधुनिकता का रंग हावी था। वैसे भी जिस घर में अनाप-शनाप दौलत हो वहां तरह-तरह के ऐब और गन्दी आदतें भी अपना घर बसा लेती हैं। राजेश अपने पिता के कारोबार में पार्टनर भी था इसलिए वह अपने पिता के साथ व्यापार में पूरा हाथ बंटाता था और काम के बाद पूरी अय्याशी करता था। बिल्कुल वैसा ही युवक था जैसे अक्सर अमीर घरों के युवक होते हैं। आमतौर पर होता यह है कि अधिक पैसे वाले परिवारों के बच्चे बिगड़ जाते हैं। पैसे की कोई कमी उनके पास नहीं होती इसलिए नशे आदि के ऐब सहज रूप से अपना लेते हैं। आजकल राजेश एक फैक्टरी लगाने पर विचार कर रहा था। फैक्टरी लगाने के लिए जमीन की आवश्यकता थी। वह जमीन तलाश कर रहा था। जमीन की तलाश में वह आस-पास के गांवों के चक्कर लगा रहा था। पैसे की सेठ मोहन लाल के पास कोई कमी नहीं थी। वे मुंह मांगी कीमत देने को तैयार थे लेकिन कोई जमीन बेचने को तैयार नहीं था। एक जमाना था जब जमीन की कोई कीमत नहीं थी। लोग जमीन बेचना चाहते थे लेकिन खरीदार नहीं थे। समय बदलता गया और जमीन की कीमतें बढ़ती गयीं। लोग जमीन का महत्व समझने लगे और इसीलिये जमीन मिलनी बंद हो गई।  राजेश फैक्टरी की जमीन के चक्कर में पास के गांव में गया। पास के गांव में उसकी जमीन की बात चल रही थी। वह कई किसानों की थोड़ी-थोड़ी जमीं ले रहा था। किसान काफी कोशिशों के बाद जमीन बेचने को तैयार हुए थे। वह भी तब तैयार हुए थे जब उनके परिवार के दो-दो आदमियों को नौकरी देने का वायदा किया गया था। आज राजेश उन लोगों को कुछ एडवांस देने जा रहा था। उसने नोटों का एक ब्रीफकेस पीछे वाली सीट पर रख दिया था। उसकी गाड़ी तेज गति से दौड़ती जा रही थी। मेन रोड से हटकर वह गांव के रास्ते पर चल दिया। उस रास्ते पर कार की गति धीमी हो गयी थी। अचानक उसके पैर ब्रेक पर दबाव डालते चले गए। गाड़ी एक झटके के साथ रुक गयी। सामचे एक लड़की चली जा रही थी। गाड़ी की चर्र की आवाज को सुनकर उस युवती ने पलटकर देखा। गाड़ी में एक नवयुवक बैठा था। वह मुस्करा रहा था। युवती ने एक पल उस युवक को देखा। उसे मुस्कराते देखकर उसने गरदन झुका ली। राजेश ने अपनी गाड़ी को लाकर बिल्कुल उसके बराबर में खड़ा कर दिया और कहा-“क्या नाम है तुम्हारा?&#8221; “रीमा।&#8221; “बड़ा प्यारा नाम है।” रीमा प्रत्युत्तर में खामोश रही। राजेश ने उसको सम्बोधित करते हुए कहा- “मुझे राजेश कहते हैं। सेठ मोहनलाल का बेटा हूं। हम आपके गांव में एक फैक्टरी लगाना चाहते हैं।” रीमा को इन सब बातों से क्या लेना-देना था। वह उस समय तक खड़ी रही जब तक कि राजेश बोलता रहा और फिर वह आगे को चल पड़ी। राजेश ने पुनः गाड़ी उसके बराबर में लाकर रोकते हुये कहा &#8211; “रीमा जी, आओ बैठो, मैं भी गांव ही जा रहा हूं। तुम्हें गांव में छोड़ दूंगा।&#8221; “जी नहीं।&#8221; रीमा ने कहा-“मैं आपकी गाड़ी में नहीं बैढूंगी। मैं पैदल ही जाऊंगी।” ‘‘क्यों&#8230;?” “मेरी मर्जी।” फिर राजेश ने कुछ नहीं कहा। इस बात को भी वह जानता था कि ये मामला शहर का नहीं गांव का है। यहां किसी भी तरह की, की गई हरकत खतरनाक साबित हो सकती है। वह अपनी गाड़ी आगे बढ़ा ले गया। रीमा उसी तरह से पैदल चलती रही और वह अपने घर आ गयी। शाम को राजेश रीमा के घर भी आया। अपने पिता के आवाज देकर कहने पर रीमा राजेश के लिए चाय लेकर आयी। रीमा के सामने आने पर राजेश उसे कई पलों तक अपलक निहारता रह गया। रीमा उसको इस तरह से अपनी ओर देखते पाकर शरमा गयी और चाय देकर वहां से चली गयी। राजेश ने रीमा के पिता शिवराज को एडवांस दिया, दस्तखत किये और अपनी कार में बैठकर चल दिया। रीमा राजेश को भा गयी थी। वह सोच रहा था कि चाहे जैसे भी हो रीमा हाथ ही आनी चाहिए। गदराया बदन, अंग-अंग सांचे में ढला हुआ। बार-बार रीमा का चेहरा राजेश को विण्ड स्क्रीन पर चमकता नजर आ रहा था। उसने अपनी गरदन को जोर से झटका दिया, जैसे उसने रीमा के खयालों को दिमाग से निकाल दिया हो। वह वापस लौट आया। राजेश अपने मनोमस्तिष्क से रीमा को निकाल नहीं पाया। वह बार-बार उसके खयालों में आ जाती थी। राजेश ने एक बार फिर गांव जाने का निश्चय किया। उसने सोचा शायद रीमा उसके जाल में फंस जाए। वह अपनी गाड़ी लेकर आज एकदम रात को आया। वह ऐसे टाइम पर आया था कि रीमा के पिता उसे रात्रि में वहीं रोकने का प्रयास करें और वह रुक जाए। राजेश शिवराज के यहां पहुंचा तो शिवराज ने उसे आदर से बैठाया। कुछ देर बाद रीमा उसके लिए चाय व नमकीन ले आयी। आप यह प्यार में धोखा नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  राजेश ने एक बार उसे प्यार भरी नजरों से देखकर गर्दन झका ली थी। वह जमीन के बारे में शिवराज से काफी देर तक बातें करता रहा। इसी बीच खाना तैयार हो गया। शिवराज के कहने पर राजेश ने भोजन कर लिया। भोजनोपरान्त राजेश ने कहा “अच्छा शिवराज जी, अब मैं चलता हूं।&#8221; ‘‘राजेश जी। अब जाने का समय तो नहीं है।&#8221; शिवराज ने कहा-“ये शहर नहीं है, गांव है। कोई आपकी कार भी ले लेगा और आपको बांधकर डाल देगा।” राजेश तो स्वयं ही वहां रुकना चाहता था। वह तो प्रोग्राम ही ऐसा बनाकर आया था ताकि वे रुकने को कहें और वह रुक जाए। “ऐसी बात है तो ठीक है शिवराज जी।&#8221; राजेश ने कहा- “मैं सुबह चला जाऊंगा।” शिवराज ने राजेश के लिए एक कमरे में बिस्तर लगवा दिया और वह लेट गया। करीब एक घंटे बाद रीमा दूध का गिलास लेकर आयी और उसने धीमी आवाज...</p>
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		<title>साधु की प्रेयसी &#8211; पत्नी की बेवफ़ाई की हिंदी कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 11:11:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>साधु की प्रेयसी हिंदी कहानी साधु की प्रेयसी की हिंदी कहानी / Hindi story of Wife Affair with sadhu &#8211; किस प्रकार एक पत्नी ने अपने पति की धोका दिया तथा एक साधु के साथ रही हिंदी में कहानी (तोता-मैना किस्सा) कहावत है जब दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है। इस कहावत को रजनी ने चरितार्थ किया था। उसकी नजरें एक साधु से लड़ गईं। वह साधु, साधु नहीं था, स्वादू था। जवानी दीवानी होती है। रजनी भी जवान थीं, खूबसूरत थी और उसकी इसी खूबसूरती पर साधु भी रीझ गया था। साधु की झोंपड़ी गांव से काफी दूर थी। इसकी झोंपड़ी के करीब ही एक नदी बहती थी। रजनी हर रोज देर रात में जब पूरा गांव नींद के आगोश में समाया होता था, चुपचाप उठकर साधु की झोंपड़ी में चली जाती और कई घंटे वहां रात बिताकर लौटती थी। रजनी और साधु का यह प्रेम मिलन महीनों चलता रहा। किसी को इसकी खबर नहीं थी। वह जानती थी कि उसकी इस हरकत का शायद किसी को भी पता नहीं था क्योंकि यदि पता होता तो कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई तो कुछ कहता ही या कोई रोक-टोक करता। रजनी और साधु की यह रासलीला चलती रही। वह गांव में भिक्षा मांगने आता ही था। अगर कुछ कहना होता तो वहीं पर कह जाता। उसका खाना वह स्वयं ले जाया करती थी। उसे स्वयं हाथों से खिलाती भी थी। रजनी तो साधु के मोहपाश में बंधी हुई थी लेकिन उसके घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी। हो सकता है कि उन्हें रजनी और साधु के मिलन पर शक हो गया हो या किसी ने उनसे शिकायत कर दी हो। उस साधु से रजनी का पिण्ड छुड़ाने का और कोई तरीका नहीं था। यह सबसे अच्छा तरीका था कि विवाह होने के बाद वह अपनी ससुराल चली जाएगा और उनका मिलन बन्द हो जाएगा। रजनी की शादी हो गयी। दो चार दिन बाद जब वह अपनी ससुराल से वापस आयी तो साधु के पास गयी। साधु ने रजनी के कई झापड़ लगाए और काफी बुरा-भला भी कहा उस कामी साधु ने यहां तक कहा कि अपने पति को छोड़कर क्यों नहीं आ गयी। जैसे-तैसे रजनी ने अपने प्रेमी को खुश किया। मर्द त्रिया चरित्र के आगे तो मात ही खा जाता है, सो वह भी खा गया। रजनी का फिर वही क्रम चालू हो गया। कुछ दिनों बाद उसकी ससुराल से उसका पति उसे विदा कराने आ गया। उसके पति राकेश के साथ उसके परिवार के और लोग भी थे। एक दो शायद उसके मित्र भी थे। रात्रि में काफी देर तक खाने-पीने का क्रम चलता रहा। रजनी को रात में बारह बजे के बाद समय मिला। तब वह अपने प्रेमी का खाना लेकर चल दी। जब वह घर से बाहर जा रही थी उस समय उसका पति राकेश जाग रहा था। आप यह साधु की प्रेयसी नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  उसने जब किसी को अर्धरात्रि के समय में जाते देखा तो उसे आश्चर्य हुआ और वह भी उठकर उसके पीछे-पीछे चल दिया। रजनी काफी तेज चाल चलती हुई उस साधु की झोंपड़ी पर पहुंची। रजनी ने खाना रख दिया। “तू अब तक कहां थी? मैं भूखा मर रहा हूं। तेरी राह देखते-देखते मेरी आंखें भी पथरा गयीं।” देर हो जाने की वजह से साधु रजनी को तेज स्वर में डांटने लगा। “शंकर&#8230;।&#8217; रजनी ने कहा-“आज मेरी ससुराल वाले मुझे लिवाने आए हैं, इसी वजह से देर हो गयी है।&#8221; साधु ने उसके दो-तीन झापड़ और रसीद किए और कहा-“तू तो चली जाएगी उसके बाद मेरा क्या होगा?&#8221; “शंकर&#8230;।” “बोल क्या बात है?&#8221; उसने कहा-“मेरे अन्दर ज्वाला धधक रही है।&#8221; “तुम फिक्र क्यों कर रहे हो शंकर।&#8221; रजनी ने कहा-“मैं जल्दी ही वापस आ जाऊंगी।&#8217; “तुम कल मत जाना।” शंकर ने कहा-“परसों चली जाना। तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूंगा।” “फिक्र न करो।” रजनी ने कहा-“यदि सम्भव हुआ तो मैं कल रुक जाऊंगी और उसके बाद यदि मैं ज्यादा दिन तक न आ पायी तो तुम वहां आ जाना। मैं किसी न किसी बहाने तुमसे मिलने आती रहूंगी।&#8221; “यही ठीक रहेगा।” शंकर ने कहा-“मैं वहीं आ जाऊंगा। फिर तुम्हें यहां नहीं आना पड़ेगा और हमारा मिलन होता रहेगा।” राकेश झोंपड़ी के पीछे खड़ा हुआ सब सुन रहा था, सब देख रहा था। उसकी आंखों में खून उतर आया था। उसके जी में आ रहा था कि उसी समय उन दोनों को जान से मार दे। मगर न जाने क्या सोचकर वहां से चला आया और आकर चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया। दूसरे दिन राकेश ने जानबूझकर जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया। यह जानकर की जाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया रजनी बहुत प्रसन्न हुई। लेकिन उसने अपनी प्रसन्नता पति पर या घर के किसी अन्य सदस्य पर जाहिर नहीं की। पत्नी की बेवफ़ाई की हिंदी कहानी दूसरे दिन रात्रि में&#8230;। भोजन करने के बाद राकेश चुपचाप वहां से चला गया। वह वहां से तेज-तेज चलता हुआ उस साधु की झोपड़ी पर आया। उसने वहां जाकर साधु शंकर के दो टुकड़े कर डाले। और फिर वह वहीं पर खड़े एक पेड़ पर चढ़ गया। वह अपने आपको पत्तों में छुपाए हुए था। करीब एक घंटे बाद उसकी पत्नी रजनी वहां आ गयी। वह एक हाथ में थाल में शंकर के लिए भोजन लिए हुए थी। उसने दुल्हन की तरह श्रृंगार कर रखा था। रजनी शंकर की झोंपड़ी में पहुंची। उसने वहां जाकर शंकर के दो टुकड़े देखे। शंकर की यह हालत देखकर रजनी की जो हालत हुई वह देखने लायक थी। आप यह साधु की प्रेयसी नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  उसने वहीं पास में पड़ा हुआ गंडासा उठा लिया था और नदी किनारे पर इधर-से-उधर तक दौड़ती फिर रही थी। निश्चित था कि यदि शंकर का कत्ल करने वाला उसे मिल जाता तो वह उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालती। प्रेम और विरह की अग्नि ने उसके तन-बदन में आग लगा रखी थी। उसने नदी के किनारे पर इधर-से-उधर कई चक्कर काटे और जब कोई नजर न आया तो गंडासे को वहीं पर डालकर लकड़ियां इकट्ठी करने लगी। कुछ लकड़ियां तो उसकी झोंपड़ी में थीं। कुछ और इकट्ठी कीं और फिर उसके सिर को...</p>
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		<title>सन्देह की ज्वाला &#8211; राजकुमार की हिंदी कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[lokhindi]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 09:36:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[LOVE STORIES HINDI]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Story]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi story of King]]></category>
		<category><![CDATA[Rajkumar ki hindi kahani]]></category>
		<category><![CDATA[एक राजकुमार और राजकुमारी के प्रेम की हिंदी में कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[राजकुमार की हिंदी कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[सन्देह की ज्वाला]]></category>
		<category><![CDATA[सन्देह की ज्वाला हिंदी कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सन्देह की ज्वाला कहानी सन्देह की ज्वाला हिंदी कहानी / Hindi story of King, Rajkumar (Flame of doubt) &#8211; एक राजकुमार और राजकुमारी के प्रेम की हिंदी में कहानी (तोता-मैना किस्सा) ज्योतिपुर में शिवदत्त नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार बेटे थे। शिवदत्त के सबसे छोटे बेटे का नाम अजयकुमार था। वह बड़ा साहसी, वीर और बुद्धिमान था। इन गुणों के साथ-साथ वह सुन्दर भी था। उसकी पत्नी का नाम मीना था। वह भी रूपवान एवं गुणवान थी। अजय और मीना में काफी प्रेम था। मीना अपने पति के बगैर एक पल भी नहीं रह सकती थी। एक बार राजकुमार अजय अपने मित्र तथा कुछ सैनिकों के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। वहां उन दोनों को एक बहुत ही सुन्दर व मोटा ताजा हिरण दिखाई दिया। उसे देखकर दोनों मित्रों ने अपने घोड़े उस हिरण के पीछे दौड़ाए। वह हिरण भी दोनों राजकुमारों को देखकर अपने प्राण बचाने के लिए जंगल में बहुत दूर निकल गया। राजकुमार का मित्र जिसका नाम अक्षय था, वह तो रुक गया मगर राजकुमार उस हिरण के पीछे घोड़ा दौड़ाता ही रहा। मगर काफी प्रयास के बाद भी हिरण हाथ नहीं लगा। राजकुमार थक गया। उसे प्यास और गर्मी सताने लगी। इसलिए वह एक तालाब के निकट बैठकर मुंह-हाथ धोकर जल पीना ही चाहता था कि एक पक्षी ने उस पर मल कर दिया। राजकुमार ने क्रोधित होकर धनुष बाण से पक्षी को निशाना बनाना चाहा, परन्तु वह पक्षी उड़ गया। राजकुमार ने पक्षी को काफी बुरा-भला कहा, फिर कुछ देर बाद सामान्य होकर ठंडा पानी पिया और हाथ-मुंह धोकर घोड़े पर सवार होकर आसपास के क्षेत्र में टहलने लगा। वह थोड़ा आगे चला तो उसने देखा कि वहां एक बड़ा मनोहारी बाग है और उसके चारों ओर रंगीन दीवार खिंची हुई है। राजकुमार अपने घोड़े को बाग के दरवाजे पर बांधकर बाग के भीतर सैर करने लगा। वहां उसे पेड़ों की ओट से कुछ स्त्रियों के बोलने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। थोड़ी दूर जाकर देखा कि मखमली घास पर तीन स्त्रियां फूलों की कलियां हाथ में लेकर टहल रही हैं। वे स्त्रियां इतनी सुन्दर थीं कि उनके रूप को देखकर राजकुमार उन पर मोहित होकर अपने होशो-हवास खोने लगा, परन्तु वह हिम्मत बांधकर खड़ा रहा। राजकुमार अपने मन में कहने लगा-&#8216;ये स्त्रियां इतनी सुन्दर हैं कि राजा के निवास में भी इतनी सुन्दर स्त्रियां नहीं होंगी। इन तीनों में से बीच वाली तो मानो साक्षात् कामदेव की पत्नी रति है। ऐसी रूपवान स्त्री मैंने आज तक नहीं देखी। यह देवकन्या है या अप्सरा, इसका भेद अवश्य जानना चाहिये। आप यह सन्देह की ज्वाला नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  यह बात मन में विचार कर राजकुमार आगे बढ़ा तो उस स्त्री की निगाह भी राजकुमार पर षड़ी, जब उन दोनों की नजरें चार हुईं तो वह भी राजकुमार पर मोहित हो गई। परन्तु लज्जावश सखियों का साथ छोड़कर दूसरी ओर चली गई और चम्पा की ओट से राजकुमार को देख सखियों से कहने लगी-“देखो तो सही, सूर्य के समान तेजवान तथा कामदेव के समान रूपवान वह पुरुष कौन है, जो यहां आया है?&#8221; इतने में राजकुमारं सखियों के पास आया और पूछने लगा-“तुम कौन हो? यह बाग किसका है और तुम्हारी सखी का क्या नाम है?” “हे परदेसी! यह बाग महाराज स्वर्गसेन का है और यह उनकी बेटी है। इसका नाम चम्पकलता है। हम दोनों उसकी सहेलियां हैं। मेरा नाम चित्रलेखा तथा इसका नाम मोहिनी है। हम लोग आज बसन्त होने के कारण बाग की सैर करने आए हैं।” सखी ने कहा।. “आपका कहना सत्य है, जैसा आप की सखी का नाम है, वैसी ही रूपवान व गुणवान वह स्वयं हैं।” राजकुमार चम्पकलता की प्रशंसा करने लगा। राजकुमार यह कह ही रहा था कि इतने में चम्पकलता ने चित्रलेखा और मोहिनी को पुकारा “सखियो! यहां आओ, देखो यह पापी भंवरा मुझे सता रहा है। चमेली और मालती के फूलों को छोड़कर मेरे ही मुख पर बैठता है। इसको बहुत भगाती हूं, पर यह नहीं भागता। आओ इससे कहीं दूर चलें।” &#8220;ऐसा कहकर चम्पकलता दूसरी क्यारी में खड़ी हो गयी। तब वहां भी भंवरों के झुण्ड उड़ने लगे। चम्पकलता अपनी सखियों से कहने लगी–‘देखो सखी, यहां भी इन बेईमान भवरों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।”  यह कहकर वह वहां से भी चल दी। परन्तु भंवरों ने तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और उसके आसपास मंडराने लगे। तब चम्पकलता अपनी सखियों से कहने लगी-“हे प्यारी सखियो! मुझे इन पापी भंवरों से बचा लो।&#8221; तब सखियों ने उन्हें बहुत उड़ाया, मगर भंवरे कब मानते हैं। खूबसूरती पर तो भंवरे मंडराते ही हैं। लाचार होकर चम्पकलता वहां से चलने को हुई तो वह राजकुमार क्यारी से भंवरे उड़ाने लगा और बोला “हे राजकुमारी! अब तुम किसी बात की चिन्ता न करो, तुम्हारी रक्षा के लिए मैं हाजिर हूं, क्योंकि राजाओं का धर्म है कि वह भयभीत की रक्षा करें।&#8217; चम्पकलता शरमाकर चम्पा के पेड़ के पीछे चली गई। “हे राजकुमारी, आप अलग क्यों चली गईं। देखो, यह भी कोई राजकुमार हैं, इनका अनादर नहीं करना चाहिए।&#8221; यह देखकर चित्रलेखा बोली। सखियों की बात सुनकर चम्पकलता ने इशारे से कहा कि अच्छा इन्हें यहां बुलाओ। चित्रलेखा राजकुमार से बोली-“आओ मुसाफिर! तुम यहां आओ और कुछ जलपान करो ।” तब राजकुमार बोला-“हमारा हृदय तो आपके मीठे वचनों से ही ठंडा ही रहा है तथा आपके दीदार से हमारा पेट भरा जा रहा है।” लेकिन चित्रलेखा ने बड़े आदर से गलीचे बिछाकर राजकुमार को आदर सहित बैठाया। राजकुमार ने कहा-“आप लोग भी बैठे।&#8221; . जब वे सब बैठ गईं तो चित्रलेखा बोली “आपका देश कहां है? उसका क्या नाम है तथा आपका क्या नाम है और आपका यहां किस कारण से आना हुआ?&#8221; तब राजकुमार ने उन्हें अपने बारे में सब कुछ बता दिया और उनसे कहा- “अब आप अपनी राजकुमारी के विषय में कुछ बताएं।&#8221; तब चित्रलेखा बोली-“यह राजा स्वर्गसेन की बेटी हैं। राजा इनका विवाह अभी नहीं करना चाहते।&#8221; ‘‘तुम्हारी सखी ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है जो इनके पिता इनका विवाह नहीं करते?&#8221; राजकुमार ने अधीर होकर पूछा। तब चित्रलेखा ने बताया- ‘‘इनके पिता के पास एक नारंगी के समान मोती है, वह कहते हैं कि जो व्यक्ति इस मोती...</p>
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