भारतीय अर्थव्यवस्था: Essay in Hindi – निबन्ध

Essay in Hindi – भारतीय अर्थव्यवस्था

This essay in hindi has been written above the Indian economy, which focuses on unemployment, black money, poverty, inflation and other things!


आधार – बिंद
1. भूमिका: भारतीय अर्थव्यवस्था: चिंतनीय स्थिति
2. गरीबी एवं आर्थिक विषमता
3. बेरोजगारी
4. महंगाई और खाली होता राजकोष
5. विदेशी एवं स्वदेशी रेड की समस्याएं
6. हिनॉर्थ प्रबंधन की समस्या
7. काला धन
8. वैश्वीकरण का दबाव
9. उपसंहार: अर्थव्यवस्था को पुनरचित करने की चुनौती

भारतीय अर्थव्यवस्था चिंतनीय स्थिति
स्वतंत्रता पूर्व की भारत की जड़ीभूत, गतिहिन अर्थव्यवस्था को आजादी के बाद योजनाबद्ध आर्थिक कार्यक्रम द्वारा गतिशील बनाने का प्रयास किया गया है | फलस्वरूप औद्योगिक संरचना का सुदृढ़ आधार तैयार हुआ है, विदेशी व्यापार में 90 गुना वृद्धि हुई है | कृषि में हरित क्रांति द्वारा उपज में तेजी से वृद्धि हुई है, परिवहन व संचार व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं | पिछले 13 वर्षों में लागू किए गए आर्थिक सुधारों से नवीन तकनीक का प्रयोग बढ़ा है | भारत के निर्यात एवं विदेशी पूंजी भंडार में वृद्धि हुई है और भुगतान संतुलन में अनुकूलता मिली है, इसके बावजूद आजादी की अर्ध शताब्दी गुजर जाने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ समस्याएं जवलंत बनी हुई है जिन पर प्रत्येक भारतीय को गंभीरता से विचार करना चाहिए |
“गरीबी हटाओ” और “आत्मनिर्भरता” के सुखद सपनों के महल आर्थिक पेचीदगियों के झंझावातों में ढह रहे हैं | देश दिशा-शुंन्य स्थिति में बढ़ रहा है, हर व्यक्ति परेशान है, महंगाई, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, काले धन और भ्रष्टाचार से जन-जन परेशान है तथा शोषण, अधिनायकवाद, अराजकता एव अपराधीपन के कारण व्यापक असंतोष के लक्षण नजर आ रहे हैं | देश के अधिकतर नीति-निर्माता, सत्ता- लोलुप, भ्रष्ट और विवेकहिन है, अत: भारतीय अर्थव्यवस्था की न केवल दुर्दशा है बल्कि दिशाशुंन्यता भी है इसलिए हमारी अर्थव्यवस्था की समस्याओं का वस्तुगत विश्लेषण आवश्यक है | हमें विचार करना है कि ए.एम. खुसरो का यह कथन हमारे लिए कैसे सार्थक होकी “ 19 वी सदी ब्रिटेन की थी, 20 वी सदी अमेरिका की है और 21 वी सदी भारत के नाम लिखी जाएगी |”  दरअसल आज हमारी अर्थव्यवस्था की तत्कालीन चुनौतियों में सबसे ऊपर तो निरंतर बढ़ती – “बेरोजगारी” है | औद्योगिक मंदी हमें घेरती जा रही है, रुपया एक पतन सील मुद्रा के रूप में गिरता जा रहा है, निर्यात दर की गिरावट जारी है, ज़िद्दी राजकोषीय घाटा है, सैकड़ों फरमाइशो के साथ रूठे बैठे उद्योग चेंबर है और नियंत्रित मुद्रास्फीति के आंकड़ों के बावजूद क्रय-शक्ति के अभाव में जूझ रही गरीब जनता है | संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार हम 175 देशों में 124 वे से खिसककर 127 वे स्थान पर पहुंच गए हैं | दुनिया के सर्वाधिक लगभग 25 करोड़ भूखे लोग भारत में ही है, 4 करोड़ बच्चे शिक्षा से वंचित है | वैश्वीकरण और उदारीकरण की पैरवी करने वाले हमारे नीति-निर्धारकों के लिए अर्थव्यवस्था की यह तस्वीर उसके संपूर्ण ढांचे तथा समस्या के महत्वपूर्ण पक्षों को समझने की ओर संकेत करती है | You Read This Essay in Hindi on Lokhindi.com

गरीब एवं आर्थिक विषमता
हमने स्वराज चाहा था ताकि हम सूर्योदय कर सकें लेकिन आजादी के बाद हमारे द्वारा मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाने के बावजूद देशवासियों में आय व संपत्ति की विषमता निरंतर बढ़कर आज भयंकर रूप धारण कर चुकी है ०.5 % लोगों के पास देश की 10 % संपदा जमा है और ऊपर के 8% लोग 50% संपत्ति के मालिक हैं, जबकि नीचे 60% लोगों के पास कुल राष्ट्रीय आय का 10% भाग ही आता है | भूमि सुधारों के बावजूद भूमि वितरण को लेकर असमानता है, 39 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या के पास केवल 5% भूमि का स्वामित्व है, जबकि 8% संपन्न किसान 46% भूमि पर कब्जा जमाए हुए हैं | जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक प्रबंधक को एक करोड़ रुपए वार्षिक वेतन देती हैं वहां एक दैनिक वेतन भोगी मजदूर को 40 से 50 रूपए प्रतिदिन मजदूरी मिलती है | पिछले 40 वर्षों में टाटा बिरला की संपत्ति 40 गुना बढ़ी है, जबकि अभी भी 29.8 % लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, जिन्हें भरपेट भोजन एवं पहनने को कपड़ा उपलब्ध नहीं है | इस प्रकार पंचवर्षीय योजना प्रारंभ करने के समय का यह सोच असिद्ध साबित हुआ है कि ‘योजनाबद्ध विकास समाजवादी प्रकृति का होगा, जिसमें सबसे गरीब तबके के विकास को प्राथमिकता मिलेगी |’ जिस प्रकार संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक विषमताओं की और दौड़ रही है तथा गरीब देशों और अमीर देशों के बीच विकास की खाई घटने के स्थान पर तेजी से बढ़ती जा रही हैं, उसी प्रकार भारत में अमीरों और गरीबों के बीच अंतर कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है | देश में चंद लोगों के पास अपार दौलत है तो दूसरी और गरीब लोगों के पास दरिद्रता, भूख, उत्पीड़न, अशिक्षा और बीमारी है | गरीबी से नीचे जीने वालों के लिए आधा पेट भोजन, मिट्टी के टूटे बर्तन, निकली हुई हड्डियां, पीली आंखें, सुखी खाल, फोड़े युक्त पैर, मुरझाए चेहरे और काली आंखों में गहरी दीनता व निराशा इनकी वास्तविक कहानी है | हमने आर्थिक विकास का लक्ष्य सकल राष्ट्रीय आय (जी.एन.पी) मैं वृद्धि माना; किंतु इससे सूर्योदय नहीं हुआ | भारत के विकासवादियो ने जो यह मान्यता स्थापित की की अधिकतम वृद्धि दर से देश का आर्थिक विकास हो जाएगा | वह हमें गरीबी, बेरोजगारी, आय-विषमता और शोषण से मुक्ति नहीं दिला सकी, बल्कि विपरीत दिशा की ओर बढ़ाती ले गई | अतः अब हमें भारतीय अर्थव्यवस्था के ढांचे पर गंभीरता के साथ पुनर्विचार करना है ताकि अर्थव्यवस्था में उत्पादन एवं वितरण को लेकर सबकी सहभागिता हो तथा आर्थिक विकास का प्रभाव सब लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कुशलता आधारित रोजगार का सामर्थ्य बढ़ाने में नजर आए | इसके लिए न केवल समता आधारित बल्कि सवृद्धि और समानता के बीच सकारात्मक संबंध बिठाने वाले आर्थिक ढांचे को तलाशना होगा तथा इसके लिए राष्ट्रव्यापी सोच की आवश्यकता होगी |

बेरोजगारी
संसार के पांच आर्थिक राक्षस मनुष्य का दमन करने पर तुले रहते हैं – गरीबी, रोग, अज्ञानता, गंदगी और बेरोजगारी, परंतु इनमें सबसे भयंकर है– बेरोजगारी, क्योंकि वह व्यक्ति की आर्थिक सामर्थ्य को रक्त प्रदान करने वाली धमनी है | भारत में बेरोजगारी को दूर करने के प्रयत्न हुए हैं फिर भी आज देश की खुली बेरोजगारी, अदृश्य बेरोजगारी, अस्थिर बेरोजगारी, चक्रीय बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी एव तकनीकी बेरोजगारी आदि सभी विद्यमान है तथा किसी न किसी रूप में 25 करोड़ लोग बेरोजगार हैं | भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए समय-समय पर नई नई नीतियों की घोषणा की गई और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम भी संचालित किए गए; किंतु आज भी कुल श्रम शक्ति का एक तिहाई से भी अधिक भाग बेरोजगारी से ग्रस्त है जबकि सरकार ने 12 वी पंचवर्षीय योजना में रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है | योजना आयोग के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रतिवर्ष 4% रोजगार वृद्धि की जरूरत है, जबकि वर्तमान में यह वृद्धि दर 2.50 प्रतिशत है | अतः अब वृद्धि दर को बढ़ाना आवश्यक है यह तभी संभव है जब घरेलू उत्पाद दर 8 प्रतिशत हो, लेकिन आधुनिक, तकनीकों का उपयोग, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के फलस्वरूप रोजगारोनमुख घरेलू उद्योगों के पतन, सार्वजनिक उपक्रमों से हो रही छंटनी के कारण देश में बेरोजगारी बढ़ेगी | इसलिए आने वाले समय में बेरोजगारी के बढ़ने के आसार अधिक है | अतः एक और जनसंख्या पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है तो दूसरी ओर रोजगारोनमुख अर्थव्यवस्था को विकसित करना है, इसके लिए भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहराई से पुनचिंतन की आवश्यकता है | You Read This Essay in Hindi on Lokhindi.com

महंगाई और खाली होता राजकोष
वर्ष 1991 में मुद्रास्फीति 16.4 प्रतिशत तक पहुंच गई थी | लेकिन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के कारण अब यह 6 से 8 प्रतिशत के बीच झूलती रहती है | मुद्रास्फीति नियंत्रित हुई है, फिर भी महंगाई बढ़ रही है | जिसकी मुख्य मार गरीब लोगों पर पड़ती है | केंद्रीय सरकार एवं प्रादेशिक सरकारों का बजट घाटा भी सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में बढ़ता जा रहा है | इसी प्रकार सरकार का प्रतिवर्ष वित्तीय घाटा 5 करोड़ रुपए से भी अधिक तक पहुंचने लगा है | छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों का अत्यधिक वेतन बढ़ा कर उसमें 61% महंगाई भत्ते को वेतन में जोड़कर राजकोष को खाली करने, महंगाई बढ़ाने तथा विकास कार्यों के लिए देसी विदेशी कर्ज लेने के लिए हम विवश हो गए हैं | यह सब देश की अर्थव्यवस्था के कमजोर होने तथा आम आदमी के प्रतिकूल बनते जाने का संकेत है | इसलिए जहां एक और सकल उत्पादन के बढ़ाने के प्रशन हैं, वहीं दूसरी और उसे आत्मनिर्भर बनाने, पूंजीपति निवेश के बढ़ाने और अपव्यय को कठोरता से रोकने की चुनौती है | Essay in Hindi on Lokhindi.com

Essay in Hindi – भारतीय अर्थव्यवस्था: चिंतनीय स्थिति

विदेशी एवं स्वदेशी ऋण की समस्या
हम सन 1957 में ही विदेशी मुद्रा भंडार को समाप्त कर चुके थे और उसके बाद हम विदेशी कर्ज को लगातार बढ़ाते ही गए | हमने हमारी योजनाओं में सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योगों को न केवल विदेशी तकनीक पर बल्कि विदेशी पूंजी पर आधारित बनाया और उसके लिए हम कर्ज-दर-कर्ज लेते गए | 1972-73 एव 1976-77 के अलावा विदेशी व्यापार में भुगतान संतुलन हमारे पक्ष में कभी नहीं रहा | 1996 में हमने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से ऋण मांगा | सन 2012 तक कुल विदेशी ऋण इतना हो गया है की जो जी.डी.पी के 20% से भी अधिक है |
आज प्रत्येक भारतीय पर विदेशी ऋण के केवल ब्याज की अदायगी का भार 1000 रु. से अधिक है | इस प्रकार भारतीय वस्तुओं के निर्यात में अपेक्षाकृत वर्दी नहीं होना, रुपए का अवमूल्यन होना तथा विदेशी एवं स्वदेशी ऋण तथा बयाज के बढ़ते जाने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एक ऋणग्रस्त तथा उत्पादन लाभ से वंचित गरीब व्यक्ति की तरह दुष्चक्र मैं फसी हुई है | सार्वजनिक स्तर पर कठोर वित्तीय अनुशासन, अनावश्यक उपभोग पर नियंत्रण तथा निर्यात के तेजी से बढ़ाने पर ही विदेशी एव स्वदेशी ऋण के दुष्चक्र से बचा जा सकता है |

हिनॉर्थ प्रबंधन (Deficit Financing) की समस्या
हम भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं को अनुत्पादन कार्यों पर अपव्यय, सार्वजनिक वित्त में से भ्रष्टाचार द्वारा निश्चित राशि का अपहरण और इस प्रकार पूंजी की रहने वाली कमी से हमारे बजट घाटे की अर्थव्यवस्था पर आधारित होकर बनाते गए हैं | घाटे की अर्थव्यवस्था का यह वित्तीय प्रबंध अंततः मुद्रास्फीति, महंगाई आदि के दुष्चक्र को बढ़ाता है | अनुत्पादक क्षेत्रों में कठोर वित्तीय अनुशासन ही इसका उपाय हो सकता है, जो गहरी राजनीति इच्छा पर निर्भर करता | You Read This Essay in Hindi on Lokhindi.com

काला धन
आज भी अर्थव्यवस्था मुलत: काले धन पर विकसित हुई अर्थव्यवस्था है | जो हमारे नैतिक चरित्र के पतन का संकेत है | देश में चोरबाजारी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, तस्करी तथा कर बचाने के कारण कालाधन इतना बढ़ चुका है कि बड़ी अर्थव्यवस्था तो काले धन पर ही चल रही है | आज देश में 40% से अधिक तो कालाधन ही है, जो कई लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है | समय-समय पर इस काले धन को बाहर लाने के लिए सरकार ने योजनाएं घोषित की है; किंतु जिस गति से इसे नियमित धन में बदलने का प्रयास है उससे अधिक तेजी से कालेधन के बनते जाने की श्रंखला है | इस प्रकार काला धन देश के वित्तीय अनुशासन को, उसके अधिकाधिक उपयोग को प्रभावित करता है और अंततः पूंजी की कमी पैदा करता है | काले धन को कम करने के लिए नैतिक चरित्र का निर्माण एव बेहतर कराधान ही उपयुक्त उपाय है | मनी लांड्रिंग बिल भी इसी निमित्त में पारित किया गया है |  Essay in Hindi 

वैश्वीकरण का दबाव
आर्थिक सुधार के अंतर्गत भारत ने अपने द्वार विदेशी पूंजी और निवेशकों के लिए खोल दिए है | भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होने के नाते विदेशी कंपनियों के लिए सबसे बड़े बाजार के रूप में विकसित हुआ है | भारत पर लगातार विदेशी दबाव बना हुआ है | भारतीय बाजार पर अमेरिकी कंपनियों की कैसी गिद्ध दृष्टि है, इसका अंदाज निम, हल्दी और बासमती चावल के पेटेंट संबंधी विवादों से होता है | दरअसल हमें विश्व व्यापार संगठन के साथ किए गए अनुबंधन में संशोधन करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसके अंतर्गत देश को अपनी कुल खाद्यान्न खपत का 3 प्रतिशत आयात करना आवश्यक है कि खाद्यान्न आत्मनिर्भरता के विपरीत धारणा है | वर्तमान टैरिफ दरों में घरेलू उद्योगों के हित में बढ़ोतरी की समस्या पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है |  Essay in Hindi 

अर्थव्यवस्था को पुनः रचित करने की चुनौती
वस्तुतः आजादी के बाद हमने अर्थव्यवस्था के स्तर पर चहुंमुखी विकास किया है; किंतु देश के विद्यमान मानवीय एवं भौतिक संसाधनों को देखते हुए समता- उन्मुख, शोषण- रहित नैतिकता पर आधारित एक संतुलित अर्थव्यवस्था को विकसित नहीं कर सके हैं | हमने प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं मैं उलझ गए | इसके बाद हमने उदारीकरण पर आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाया तथा पूंजी एवं विकसित तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था के समक्ष झुके और समता एवं श्रम- आधारित सूर्योदयी अर्थव्यवस्था को पीतांजलि दे बैठे | इसलिए हमें भारतीय संसाधनों एवं वर्तमान में चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याओं को देखते हुए गहराई के साथ पुनरचिंतन करने की आवश्यकता है | You Read This Essay in Hindi on Lokhindi.com
यदि हम सरकारी खर्च में कमी करते हैं, अमरत्य सेन के सुझावों अनुसार शिक्षा एव स्वास्थ्य जैसी मानव विकास की सेवाओं में तेजी से सुधार करते हैं, कृषि एवं लघु उद्योगों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करते हैं | सब्सिडी को कम करते हैं, उद्योगों में स्वस्थ प्रतियोगिता विकसित करते हैं, राजस्व वृद्धि हेतु अप्रत्यक्ष कर ढांचे में सुधार करते हैं तथा भ्रष्टाचार के स्थान पर देश में एक अनुशासित एवं इमानदार कार्य संस्कृति का निर्माण करते हैं तो हम देश की अर्थव्यवस्था के विकास में गति ला सकते हैं |  Essay in Hindi  

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Written by lokhindi
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