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	<title>LOVE STORIES HINDI &#8211; Lok Hindi</title>
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	<title>LOVE STORIES HINDI &#8211; Lok Hindi</title>
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		<title>प्यार में धोखा &#8211; प्रेम और धोखे की हिंदी (दास्तान) कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 16:03:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्यार में धोखा हिंदी कहानी प्यार में धोखा हिंदी कहानी / Pyar me dhokha Hindi Kahani (Betrayal In Love) &#8211; प्रेम और धोखे की हिंदी दास्तान (तोता-मैना किस्सा) राजेश अपने पिता सेठ मोहन लाल का इकलौता बेटा था। मोहन लाल के पास बेशुमार दौलत थी। राजेश पर आधुनिकता का रंग हावी था। वैसे भी जिस घर में अनाप-शनाप दौलत हो वहां तरह-तरह के ऐब और गन्दी आदतें भी अपना घर बसा लेती हैं। राजेश अपने पिता के कारोबार में पार्टनर भी था इसलिए वह अपने पिता के साथ व्यापार में पूरा हाथ बंटाता था और काम के बाद पूरी अय्याशी करता था। बिल्कुल वैसा ही युवक था जैसे अक्सर अमीर घरों के युवक होते हैं। आमतौर पर होता यह है कि अधिक पैसे वाले परिवारों के बच्चे बिगड़ जाते हैं। पैसे की कोई कमी उनके पास नहीं होती इसलिए नशे आदि के ऐब सहज रूप से अपना लेते हैं। आजकल राजेश एक फैक्टरी लगाने पर विचार कर रहा था। फैक्टरी लगाने के लिए जमीन की आवश्यकता थी। वह जमीन तलाश कर रहा था। जमीन की तलाश में वह आस-पास के गांवों के चक्कर लगा रहा था। पैसे की सेठ मोहन लाल के पास कोई कमी नहीं थी। वे मुंह मांगी कीमत देने को तैयार थे लेकिन कोई जमीन बेचने को तैयार नहीं था। एक जमाना था जब जमीन की कोई कीमत नहीं थी। लोग जमीन बेचना चाहते थे लेकिन खरीदार नहीं थे। समय बदलता गया और जमीन की कीमतें बढ़ती गयीं। लोग जमीन का महत्व समझने लगे और इसीलिये जमीन मिलनी बंद हो गई।  राजेश फैक्टरी की जमीन के चक्कर में पास के गांव में गया। पास के गांव में उसकी जमीन की बात चल रही थी। वह कई किसानों की थोड़ी-थोड़ी जमीं ले रहा था। किसान काफी कोशिशों के बाद जमीन बेचने को तैयार हुए थे। वह भी तब तैयार हुए थे जब उनके परिवार के दो-दो आदमियों को नौकरी देने का वायदा किया गया था। आज राजेश उन लोगों को कुछ एडवांस देने जा रहा था। उसने नोटों का एक ब्रीफकेस पीछे वाली सीट पर रख दिया था। उसकी गाड़ी तेज गति से दौड़ती जा रही थी। मेन रोड से हटकर वह गांव के रास्ते पर चल दिया। उस रास्ते पर कार की गति धीमी हो गयी थी। अचानक उसके पैर ब्रेक पर दबाव डालते चले गए। गाड़ी एक झटके के साथ रुक गयी। सामचे एक लड़की चली जा रही थी। गाड़ी की चर्र की आवाज को सुनकर उस युवती ने पलटकर देखा। गाड़ी में एक नवयुवक बैठा था। वह मुस्करा रहा था। युवती ने एक पल उस युवक को देखा। उसे मुस्कराते देखकर उसने गरदन झुका ली। राजेश ने अपनी गाड़ी को लाकर बिल्कुल उसके बराबर में खड़ा कर दिया और कहा-“क्या नाम है तुम्हारा?&#8221; “रीमा।&#8221; “बड़ा प्यारा नाम है।” रीमा प्रत्युत्तर में खामोश रही। राजेश ने उसको सम्बोधित करते हुए कहा- “मुझे राजेश कहते हैं। सेठ मोहनलाल का बेटा हूं। हम आपके गांव में एक फैक्टरी लगाना चाहते हैं।” रीमा को इन सब बातों से क्या लेना-देना था। वह उस समय तक खड़ी रही जब तक कि राजेश बोलता रहा और फिर वह आगे को चल पड़ी। राजेश ने पुनः गाड़ी उसके बराबर में लाकर रोकते हुये कहा &#8211; “रीमा जी, आओ बैठो, मैं भी गांव ही जा रहा हूं। तुम्हें गांव में छोड़ दूंगा।&#8221; “जी नहीं।&#8221; रीमा ने कहा-“मैं आपकी गाड़ी में नहीं बैढूंगी। मैं पैदल ही जाऊंगी।” ‘‘क्यों&#8230;?” “मेरी मर्जी।” फिर राजेश ने कुछ नहीं कहा। इस बात को भी वह जानता था कि ये मामला शहर का नहीं गांव का है। यहां किसी भी तरह की, की गई हरकत खतरनाक साबित हो सकती है। वह अपनी गाड़ी आगे बढ़ा ले गया। रीमा उसी तरह से पैदल चलती रही और वह अपने घर आ गयी। शाम को राजेश रीमा के घर भी आया। अपने पिता के आवाज देकर कहने पर रीमा राजेश के लिए चाय लेकर आयी। रीमा के सामने आने पर राजेश उसे कई पलों तक अपलक निहारता रह गया। रीमा उसको इस तरह से अपनी ओर देखते पाकर शरमा गयी और चाय देकर वहां से चली गयी। राजेश ने रीमा के पिता शिवराज को एडवांस दिया, दस्तखत किये और अपनी कार में बैठकर चल दिया। रीमा राजेश को भा गयी थी। वह सोच रहा था कि चाहे जैसे भी हो रीमा हाथ ही आनी चाहिए। गदराया बदन, अंग-अंग सांचे में ढला हुआ। बार-बार रीमा का चेहरा राजेश को विण्ड स्क्रीन पर चमकता नजर आ रहा था। उसने अपनी गरदन को जोर से झटका दिया, जैसे उसने रीमा के खयालों को दिमाग से निकाल दिया हो। वह वापस लौट आया। राजेश अपने मनोमस्तिष्क से रीमा को निकाल नहीं पाया। वह बार-बार उसके खयालों में आ जाती थी। राजेश ने एक बार फिर गांव जाने का निश्चय किया। उसने सोचा शायद रीमा उसके जाल में फंस जाए। वह अपनी गाड़ी लेकर आज एकदम रात को आया। वह ऐसे टाइम पर आया था कि रीमा के पिता उसे रात्रि में वहीं रोकने का प्रयास करें और वह रुक जाए। राजेश शिवराज के यहां पहुंचा तो शिवराज ने उसे आदर से बैठाया। कुछ देर बाद रीमा उसके लिए चाय व नमकीन ले आयी। आप यह प्यार में धोखा नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  राजेश ने एक बार उसे प्यार भरी नजरों से देखकर गर्दन झका ली थी। वह जमीन के बारे में शिवराज से काफी देर तक बातें करता रहा। इसी बीच खाना तैयार हो गया। शिवराज के कहने पर राजेश ने भोजन कर लिया। भोजनोपरान्त राजेश ने कहा “अच्छा शिवराज जी, अब मैं चलता हूं।&#8221; ‘‘राजेश जी। अब जाने का समय तो नहीं है।&#8221; शिवराज ने कहा-“ये शहर नहीं है, गांव है। कोई आपकी कार भी ले लेगा और आपको बांधकर डाल देगा।” राजेश तो स्वयं ही वहां रुकना चाहता था। वह तो प्रोग्राम ही ऐसा बनाकर आया था ताकि वे रुकने को कहें और वह रुक जाए। “ऐसी बात है तो ठीक है शिवराज जी।&#8221; राजेश ने कहा- “मैं सुबह चला जाऊंगा।” शिवराज ने राजेश के लिए एक कमरे में बिस्तर लगवा दिया और वह लेट गया। करीब एक घंटे बाद रीमा दूध का गिलास लेकर आयी और उसने धीमी आवाज...</p>
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		<title>साधु की प्रेयसी &#8211; पत्नी की बेवफ़ाई की हिंदी कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 11:11:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>साधु की प्रेयसी हिंदी कहानी साधु की प्रेयसी की हिंदी कहानी / Hindi story of Wife Affair with sadhu &#8211; किस प्रकार एक पत्नी ने अपने पति की धोका दिया तथा एक साधु के साथ रही हिंदी में कहानी (तोता-मैना किस्सा) कहावत है जब दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है। इस कहावत को रजनी ने चरितार्थ किया था। उसकी नजरें एक साधु से लड़ गईं। वह साधु, साधु नहीं था, स्वादू था। जवानी दीवानी होती है। रजनी भी जवान थीं, खूबसूरत थी और उसकी इसी खूबसूरती पर साधु भी रीझ गया था। साधु की झोंपड़ी गांव से काफी दूर थी। इसकी झोंपड़ी के करीब ही एक नदी बहती थी। रजनी हर रोज देर रात में जब पूरा गांव नींद के आगोश में समाया होता था, चुपचाप उठकर साधु की झोंपड़ी में चली जाती और कई घंटे वहां रात बिताकर लौटती थी। रजनी और साधु का यह प्रेम मिलन महीनों चलता रहा। किसी को इसकी खबर नहीं थी। वह जानती थी कि उसकी इस हरकत का शायद किसी को भी पता नहीं था क्योंकि यदि पता होता तो कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई तो कुछ कहता ही या कोई रोक-टोक करता। रजनी और साधु की यह रासलीला चलती रही। वह गांव में भिक्षा मांगने आता ही था। अगर कुछ कहना होता तो वहीं पर कह जाता। उसका खाना वह स्वयं ले जाया करती थी। उसे स्वयं हाथों से खिलाती भी थी। रजनी तो साधु के मोहपाश में बंधी हुई थी लेकिन उसके घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी। हो सकता है कि उन्हें रजनी और साधु के मिलन पर शक हो गया हो या किसी ने उनसे शिकायत कर दी हो। उस साधु से रजनी का पिण्ड छुड़ाने का और कोई तरीका नहीं था। यह सबसे अच्छा तरीका था कि विवाह होने के बाद वह अपनी ससुराल चली जाएगा और उनका मिलन बन्द हो जाएगा। रजनी की शादी हो गयी। दो चार दिन बाद जब वह अपनी ससुराल से वापस आयी तो साधु के पास गयी। साधु ने रजनी के कई झापड़ लगाए और काफी बुरा-भला भी कहा उस कामी साधु ने यहां तक कहा कि अपने पति को छोड़कर क्यों नहीं आ गयी। जैसे-तैसे रजनी ने अपने प्रेमी को खुश किया। मर्द त्रिया चरित्र के आगे तो मात ही खा जाता है, सो वह भी खा गया। रजनी का फिर वही क्रम चालू हो गया। कुछ दिनों बाद उसकी ससुराल से उसका पति उसे विदा कराने आ गया। उसके पति राकेश के साथ उसके परिवार के और लोग भी थे। एक दो शायद उसके मित्र भी थे। रात्रि में काफी देर तक खाने-पीने का क्रम चलता रहा। रजनी को रात में बारह बजे के बाद समय मिला। तब वह अपने प्रेमी का खाना लेकर चल दी। जब वह घर से बाहर जा रही थी उस समय उसका पति राकेश जाग रहा था। आप यह साधु की प्रेयसी नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  उसने जब किसी को अर्धरात्रि के समय में जाते देखा तो उसे आश्चर्य हुआ और वह भी उठकर उसके पीछे-पीछे चल दिया। रजनी काफी तेज चाल चलती हुई उस साधु की झोंपड़ी पर पहुंची। रजनी ने खाना रख दिया। “तू अब तक कहां थी? मैं भूखा मर रहा हूं। तेरी राह देखते-देखते मेरी आंखें भी पथरा गयीं।” देर हो जाने की वजह से साधु रजनी को तेज स्वर में डांटने लगा। “शंकर&#8230;।&#8217; रजनी ने कहा-“आज मेरी ससुराल वाले मुझे लिवाने आए हैं, इसी वजह से देर हो गयी है।&#8221; साधु ने उसके दो-तीन झापड़ और रसीद किए और कहा-“तू तो चली जाएगी उसके बाद मेरा क्या होगा?&#8221; “शंकर&#8230;।” “बोल क्या बात है?&#8221; उसने कहा-“मेरे अन्दर ज्वाला धधक रही है।&#8221; “तुम फिक्र क्यों कर रहे हो शंकर।&#8221; रजनी ने कहा-“मैं जल्दी ही वापस आ जाऊंगी।&#8217; “तुम कल मत जाना।” शंकर ने कहा-“परसों चली जाना। तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूंगा।” “फिक्र न करो।” रजनी ने कहा-“यदि सम्भव हुआ तो मैं कल रुक जाऊंगी और उसके बाद यदि मैं ज्यादा दिन तक न आ पायी तो तुम वहां आ जाना। मैं किसी न किसी बहाने तुमसे मिलने आती रहूंगी।&#8221; “यही ठीक रहेगा।” शंकर ने कहा-“मैं वहीं आ जाऊंगा। फिर तुम्हें यहां नहीं आना पड़ेगा और हमारा मिलन होता रहेगा।” राकेश झोंपड़ी के पीछे खड़ा हुआ सब सुन रहा था, सब देख रहा था। उसकी आंखों में खून उतर आया था। उसके जी में आ रहा था कि उसी समय उन दोनों को जान से मार दे। मगर न जाने क्या सोचकर वहां से चला आया और आकर चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया। दूसरे दिन राकेश ने जानबूझकर जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया। यह जानकर की जाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया रजनी बहुत प्रसन्न हुई। लेकिन उसने अपनी प्रसन्नता पति पर या घर के किसी अन्य सदस्य पर जाहिर नहीं की। पत्नी की बेवफ़ाई की हिंदी कहानी दूसरे दिन रात्रि में&#8230;। भोजन करने के बाद राकेश चुपचाप वहां से चला गया। वह वहां से तेज-तेज चलता हुआ उस साधु की झोपड़ी पर आया। उसने वहां जाकर साधु शंकर के दो टुकड़े कर डाले। और फिर वह वहीं पर खड़े एक पेड़ पर चढ़ गया। वह अपने आपको पत्तों में छुपाए हुए था। करीब एक घंटे बाद उसकी पत्नी रजनी वहां आ गयी। वह एक हाथ में थाल में शंकर के लिए भोजन लिए हुए थी। उसने दुल्हन की तरह श्रृंगार कर रखा था। रजनी शंकर की झोंपड़ी में पहुंची। उसने वहां जाकर शंकर के दो टुकड़े देखे। शंकर की यह हालत देखकर रजनी की जो हालत हुई वह देखने लायक थी। आप यह साधु की प्रेयसी नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  उसने वहीं पास में पड़ा हुआ गंडासा उठा लिया था और नदी किनारे पर इधर-से-उधर तक दौड़ती फिर रही थी। निश्चित था कि यदि शंकर का कत्ल करने वाला उसे मिल जाता तो वह उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालती। प्रेम और विरह की अग्नि ने उसके तन-बदन में आग लगा रखी थी। उसने नदी के किनारे पर इधर-से-उधर कई चक्कर काटे और जब कोई नजर न आया तो गंडासे को वहीं पर डालकर लकड़ियां इकट्ठी करने लगी। कुछ लकड़ियां तो उसकी झोंपड़ी में थीं। कुछ और इकट्ठी कीं और फिर उसके सिर को...</p>
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		<title>सन्देह की ज्वाला &#8211; राजकुमार की हिंदी कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 09:36:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सन्देह की ज्वाला कहानी सन्देह की ज्वाला हिंदी कहानी / Hindi story of King, Rajkumar (Flame of doubt) &#8211; एक राजकुमार और राजकुमारी के प्रेम की हिंदी में कहानी (तोता-मैना किस्सा) ज्योतिपुर में शिवदत्त नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार बेटे थे। शिवदत्त के सबसे छोटे बेटे का नाम अजयकुमार था। वह बड़ा साहसी, वीर और बुद्धिमान था। इन गुणों के साथ-साथ वह सुन्दर भी था। उसकी पत्नी का नाम मीना था। वह भी रूपवान एवं गुणवान थी। अजय और मीना में काफी प्रेम था। मीना अपने पति के बगैर एक पल भी नहीं रह सकती थी। एक बार राजकुमार अजय अपने मित्र तथा कुछ सैनिकों के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। वहां उन दोनों को एक बहुत ही सुन्दर व मोटा ताजा हिरण दिखाई दिया। उसे देखकर दोनों मित्रों ने अपने घोड़े उस हिरण के पीछे दौड़ाए। वह हिरण भी दोनों राजकुमारों को देखकर अपने प्राण बचाने के लिए जंगल में बहुत दूर निकल गया। राजकुमार का मित्र जिसका नाम अक्षय था, वह तो रुक गया मगर राजकुमार उस हिरण के पीछे घोड़ा दौड़ाता ही रहा। मगर काफी प्रयास के बाद भी हिरण हाथ नहीं लगा। राजकुमार थक गया। उसे प्यास और गर्मी सताने लगी। इसलिए वह एक तालाब के निकट बैठकर मुंह-हाथ धोकर जल पीना ही चाहता था कि एक पक्षी ने उस पर मल कर दिया। राजकुमार ने क्रोधित होकर धनुष बाण से पक्षी को निशाना बनाना चाहा, परन्तु वह पक्षी उड़ गया। राजकुमार ने पक्षी को काफी बुरा-भला कहा, फिर कुछ देर बाद सामान्य होकर ठंडा पानी पिया और हाथ-मुंह धोकर घोड़े पर सवार होकर आसपास के क्षेत्र में टहलने लगा। वह थोड़ा आगे चला तो उसने देखा कि वहां एक बड़ा मनोहारी बाग है और उसके चारों ओर रंगीन दीवार खिंची हुई है। राजकुमार अपने घोड़े को बाग के दरवाजे पर बांधकर बाग के भीतर सैर करने लगा। वहां उसे पेड़ों की ओट से कुछ स्त्रियों के बोलने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। थोड़ी दूर जाकर देखा कि मखमली घास पर तीन स्त्रियां फूलों की कलियां हाथ में लेकर टहल रही हैं। वे स्त्रियां इतनी सुन्दर थीं कि उनके रूप को देखकर राजकुमार उन पर मोहित होकर अपने होशो-हवास खोने लगा, परन्तु वह हिम्मत बांधकर खड़ा रहा। राजकुमार अपने मन में कहने लगा-&#8216;ये स्त्रियां इतनी सुन्दर हैं कि राजा के निवास में भी इतनी सुन्दर स्त्रियां नहीं होंगी। इन तीनों में से बीच वाली तो मानो साक्षात् कामदेव की पत्नी रति है। ऐसी रूपवान स्त्री मैंने आज तक नहीं देखी। यह देवकन्या है या अप्सरा, इसका भेद अवश्य जानना चाहिये। आप यह सन्देह की ज्वाला नामक कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  यह बात मन में विचार कर राजकुमार आगे बढ़ा तो उस स्त्री की निगाह भी राजकुमार पर षड़ी, जब उन दोनों की नजरें चार हुईं तो वह भी राजकुमार पर मोहित हो गई। परन्तु लज्जावश सखियों का साथ छोड़कर दूसरी ओर चली गई और चम्पा की ओट से राजकुमार को देख सखियों से कहने लगी-“देखो तो सही, सूर्य के समान तेजवान तथा कामदेव के समान रूपवान वह पुरुष कौन है, जो यहां आया है?&#8221; इतने में राजकुमारं सखियों के पास आया और पूछने लगा-“तुम कौन हो? यह बाग किसका है और तुम्हारी सखी का क्या नाम है?” “हे परदेसी! यह बाग महाराज स्वर्गसेन का है और यह उनकी बेटी है। इसका नाम चम्पकलता है। हम दोनों उसकी सहेलियां हैं। मेरा नाम चित्रलेखा तथा इसका नाम मोहिनी है। हम लोग आज बसन्त होने के कारण बाग की सैर करने आए हैं।” सखी ने कहा।. “आपका कहना सत्य है, जैसा आप की सखी का नाम है, वैसी ही रूपवान व गुणवान वह स्वयं हैं।” राजकुमार चम्पकलता की प्रशंसा करने लगा। राजकुमार यह कह ही रहा था कि इतने में चम्पकलता ने चित्रलेखा और मोहिनी को पुकारा “सखियो! यहां आओ, देखो यह पापी भंवरा मुझे सता रहा है। चमेली और मालती के फूलों को छोड़कर मेरे ही मुख पर बैठता है। इसको बहुत भगाती हूं, पर यह नहीं भागता। आओ इससे कहीं दूर चलें।” &#8220;ऐसा कहकर चम्पकलता दूसरी क्यारी में खड़ी हो गयी। तब वहां भी भंवरों के झुण्ड उड़ने लगे। चम्पकलता अपनी सखियों से कहने लगी–‘देखो सखी, यहां भी इन बेईमान भवरों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।”  यह कहकर वह वहां से भी चल दी। परन्तु भंवरों ने तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और उसके आसपास मंडराने लगे। तब चम्पकलता अपनी सखियों से कहने लगी-“हे प्यारी सखियो! मुझे इन पापी भंवरों से बचा लो।&#8221; तब सखियों ने उन्हें बहुत उड़ाया, मगर भंवरे कब मानते हैं। खूबसूरती पर तो भंवरे मंडराते ही हैं। लाचार होकर चम्पकलता वहां से चलने को हुई तो वह राजकुमार क्यारी से भंवरे उड़ाने लगा और बोला “हे राजकुमारी! अब तुम किसी बात की चिन्ता न करो, तुम्हारी रक्षा के लिए मैं हाजिर हूं, क्योंकि राजाओं का धर्म है कि वह भयभीत की रक्षा करें।&#8217; चम्पकलता शरमाकर चम्पा के पेड़ के पीछे चली गई। “हे राजकुमारी, आप अलग क्यों चली गईं। देखो, यह भी कोई राजकुमार हैं, इनका अनादर नहीं करना चाहिए।&#8221; यह देखकर चित्रलेखा बोली। सखियों की बात सुनकर चम्पकलता ने इशारे से कहा कि अच्छा इन्हें यहां बुलाओ। चित्रलेखा राजकुमार से बोली-“आओ मुसाफिर! तुम यहां आओ और कुछ जलपान करो ।” तब राजकुमार बोला-“हमारा हृदय तो आपके मीठे वचनों से ही ठंडा ही रहा है तथा आपके दीदार से हमारा पेट भरा जा रहा है।” लेकिन चित्रलेखा ने बड़े आदर से गलीचे बिछाकर राजकुमार को आदर सहित बैठाया। राजकुमार ने कहा-“आप लोग भी बैठे।&#8221; . जब वे सब बैठ गईं तो चित्रलेखा बोली “आपका देश कहां है? उसका क्या नाम है तथा आपका क्या नाम है और आपका यहां किस कारण से आना हुआ?&#8221; तब राजकुमार ने उन्हें अपने बारे में सब कुछ बता दिया और उनसे कहा- “अब आप अपनी राजकुमारी के विषय में कुछ बताएं।&#8221; तब चित्रलेखा बोली-“यह राजा स्वर्गसेन की बेटी हैं। राजा इनका विवाह अभी नहीं करना चाहते।&#8221; ‘‘तुम्हारी सखी ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है जो इनके पिता इनका विवाह नहीं करते?&#8221; राजकुमार ने अधीर होकर पूछा। तब चित्रलेखा ने बताया- ‘‘इनके पिता के पास एक नारंगी के समान मोती है, वह कहते हैं कि जो व्यक्ति इस मोती...</p>
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		<title>बेवफा बीवी (प्रेमिका) की हिंदी में कहानी</title>
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		<pubDate>Wed, 31 Jul 2019 17:05:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बेवफा बीवी की कहानी बेवफा बीवी की हिंदी कहानी / Hindi story of Bewafa Biwi (Girlfriend) &#8211; किस प्रकार उसने अपने पति को धोखा दिया और अपने देवर के साथ रंगरेलियाँ मनाती हिंदी कहानी।   राजेन्द्र काफी गरीबी में दिन गुजार रहा था। सारे दिन मेहनत-मजदूरी करके जो कुछ उसे मिलता था उससे सिर्फ उसके परिवार का खर्च ही पूरा हो पाता था। एक तरफ तो राजेन्द्र को चारों ओर से गरीबी की चादर ने लपेट रखा था, ऊपर से उसके यहां चार बेटियां पैदा हो गई थीं। गुजरते वक्त के साथ-साथ बेटियां जवानी की दहलीज पर पैर रख चुकी थीं। लेकिन पैसे के अभाव में वह अपनी एक भी बेटी के हाथ पीले नहीं कर सका था। गरीबी की बैसाखियां थामे राजेन्द्र इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि अगर उसे अपनी बच्चियों की शादी करनी है तो उसे ढेर सारी दौलत चाहिए, जो उसके पास थी नहीं। राजेन्द्र को रात-दिन अपनी बेटियों की शादी की चिन्ता घेरे रहती थी। वह सेठ राजा राम के यहां माल ढोने का काम करता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अपने मालिक से इस विषय में बात करे, शायद वह उसकी मदद कर दे। राजाराम की उम्र लगभग पचास वर्ष की थी। वह शक्ल से काफी भद्दा लगता था, मगर उसकी दौलत ने उसके इस भद्देपन को ढक रखा था। राजेन्द्र उसके ऑफिस में आया और झुककर उसका अभिनन्दन किया। राजाराम ने चेहरा उठाकर उसकी ओर देखते हुए कहा- “कहो राजेन्द्र! कैसे आना हुआ?&#8221; “मालिक।” “बोलो।” आपके पास एक आशा लेकर आया था।” राजेन्द्र ने कहा-“आपकी मदद से एक गरीब का भला हो जाएगा।&#8221; “कुछ बताओ तो सही राजेन्द्र।&#8221; “मालिक।” राजेन्द्र ने कहा-“मुझ अभागे की चार बेटियां हैं और सभी जवान हो रही हैं। यदि आप मुझे कुछ रुपया एडवांस दिला दें तो मैं अपनी एक बेटी के हाथ पीले कर दू। वह धन आप मेरी तनख्वाह से काट लीजिएगा।” राजाराम कुछ पलों तक सोचता रहा। फिर बोला-“राजेन्द्र।” “जी मालिक।” “बैठो।&#8221; राजेन्द्र डरता हुआ-सा सामने पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। राजाराम ने अपने सामने रखे इन्टरकाम का एक बटन दबाया और कहा- ‘दो चाय भिजवा दो।&#8217; राजाराम के इस रूप को देखकर राजेन्द्र मन ही मन बौखला गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह सब क्या है? वह उसके लिए चाय क्यों मंगवा रहा है। बात राजेन्द्र की समझ में नहीं आयी। क्योंकि उसने सुन रखा था कि राजाराम अपने सामने किसी को बैठाना भी पसन्द नहीं करता। फिर उसे बैठने के लिए क्यों कहा? क्यों उसके लिए चाय मंगवा रहा है? ऐसे ही ढेर सारे सवालों का तूफान उसे मथने लगा। वह विचारों में खोया हुआ था। तभी एक नौकर एक सुन्दर-सी केतली में चाय रखकर चला गया। पास ही दो कप रख गया था। सेठ राजाराम ने अपने हाथों से चाय बनायी। एक कप राजेन्द्र की ओर बढ़ाया- “लो राजेन्द्र! चाय पियो।” “मालिक।&#8217; राजेन्द्र ने कहा- &#8216;मैं भला आपके सामने चाय कैसे पी सकता हूं। कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। यह आप क्या कर रहे हैं? आपके पास अपनी एक छोटी-सी दरख्वास्त लेकर आया हूं। आपके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है।&#8221; “राजेन्द्र ।” “जी मालिक।” “तुम बेफिक्र होकर चाय पियो।” राजाराम ने कहा-“बाद में हम उस विषय में बातें करेंगे।” डरते-डरते राजेन्द्र चाय पीने लगा। ट्रे में बिस्किट्स रखे थे। मगर उसने उनमें से कोई बिस्कुट उठाया नहीं। उसने अपने जीवन में कभी यह नहीं सोचा था कि वह एक दिन सेठ राजाराम के साथ बैठकर चाय भी पी सकता है, जिसके कई मिल हैं और न जाने कितने किस्म के व्यापार हैं। चक्कर उसकी समझ में नहीं आया। एक बार उसने यह अवश्य सोचा था कि कहीं ऐसा न हो कि सेठ राजाराम जो कि विधुर है, अपने साथ उसकी बेटी का विवाह करना चाहता हो। लेकिन अपने इस ख्याल को उसने अपने दिल से निकाल दिया। भला उसके ऐसे भाग्य कहां कि जो उसकी बेटी इतने बड़े घर में चली जाए। इसी पसोपेश में उसने चाय का कप खाली करके वापस ट्रे में रख दिया। राजाराम ने भी चाय समाप्त कर ली थी। उसके बाद राजाराम ने राजेन्द्र की ओर मुखातिब होते हुए कहा-“राजेन्द्र !” “जी मालिक।”  “शायद आप यह जानते होंगे कि गत वर्ष हमारी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था।&#8221; राजाराम ने बात प्रारम्भ करते हुए कहा। “जी मैं जानता हूं।&#8221; ‘‘राजेन्द्र जी।&#8221; राजाराम ने कहा&#8212;&#8221;हमारे पास बेपनाह दौलत है लेकिन कोई वारिस नहीं है। बस एक हमारा छोटा भाई है। जब तक इस धन का उपभोग करने वाला कोई न हो, तब तक यह सब बेकार है।&#8221; ‘‘जी मैं यह जानता हूं।&#8221; आप अपनी बेटी से जाकर बात कीजिए।&#8221; राजाराम ने कहा- &#8221;यदि वो हमारे घर की लक्ष्मी बनना कबूल करे तो हमें प्रसन्नता होगी और हां, आप एक बात भली-भांति समझ लें कि आप पर किसी भी किस्म का कोई दबाव नहीं है। अगर वो स्वेच्छा से इस बात को स्वीकार करेगी तो हम आपको इतना धन देंगे कि न केवल आपकी हालत सुधर जाएगी बल्कि आप अपनी बाकी की तीनों बेटियों का विवाह भी बड़ी शान से कर सकेंगे।” “ज&#8230;ज&#8230;जी।&#8221; राजेन्द्र हकलाता हुआ बोला। अब आप आराम से घर जाइए और अपने बच्चों से बातें कीजिए। यदि हमारी बात उन्हें ठीक लगे तो आप सुबह घर पर आ जाइए। बाकी बातें वहीं होगी।&#8221; “जी।&#8221; और राजेन्द्र वहां से उठकर चला गया। उसके चले जाने के बाद राजाराम अपने ऑफिस कार्य में लग गया। राजेन्द्र प्रसन्नता से चलता हुआ अपने घर पर आया। उसने आते ही अपनी पत्नी से वह सब बातें कह दी जो राजाराम ने उससे कहीं थीं। राजाराम की तरह उसकी पत्नी भी प्रसन्न हुई। उसे लगा कि उनके मुसीबत के दिन खत्म हो गए हैं। लेकिन अगले ही क्षण उसने कहा- “अलका से तो पूछ लो?&#8221; ‘‘बुलाओ उसे ।” अलका को उन्होंने वहीं बुला लिया। वही उनकी सबसे बड़ी बेटी थी। अलका की मां ने उससे कहा-“बेटी! आज तेरे लिए मिल मालिक सेठ राजाराम का पैगाम आया है। उसकी उम्र जरूर ज्यादा है लेकिन जिन लोगों के पास धन होता है वो कभी बूढ़े नहीं होते। फिर भी उन्होंने यह कहा है कि आप लोग अपनी बेटी से पूछ...</p>
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		<title>मतलब परस्त पति &#8211; धोखेबाज पति की कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Jul 2019 10:24:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मतलब परस्त पति मतलब परस्त पति की हिंदी कहानी की किस प्रकार उसने धोखे से अपनी पत्नी को मार डाला / तोता-मैना के किस्से की रोचक दास्तान हिंदी में&#8230; काशी हिन्दुओं का पवित्र स्थान है। जहां कदम-कदम पर मन्दिर, धर्मशालाएं एवं पाठशालाएं हैं। वहीं पर पंडित रामानन्द की भी पाठशाला है, जिसमें अनेक विद्यार्थी पढ़ते थे। उन्हीं विद्यार्थियों में मथुरा का रहने वाला एक बालक भी पढ़ता था। उसका नाम कृष्णदत्त था। वह लगभग चौदह वर्ष का था। काफी सुन्दर युवक था। काशी नगरी से पांच कोस की दूरी पर एक बहुत बड़ा और रमणीक शहर था। वहां एक धनवान सेठ द्वारका प्रसाद रहता था। दान की कोई थाह नहीं होती। सेठ द्वारका प्रसाद ने एक लाख अशर्फियां दान स्वरूप देने के लिए रखी हुई थीं। उन अशर्फियों में से प्रतिदिन ब्राह्मणों को दान देता था। यह बात जब काशी के विद्यार्थियों ने सुनी तो पंडित रामानन्द की पाठशाला के विद्यार्थी भी उस सेठ के यहां अशर्फियां लेने चल दिए। उन विद्यार्थियों में कृष्णदत्त भी था। चलते समय सब विद्यार्थियों से रामानन्द पंडित ने कहा-‘‘शिष्यो! तुम लोग जा तो रहे हो परन्तु एक उपदेश याद रखना कि यदि रास्ते में श्यामा चिडिया बैठी हो तो उसके दाहिनी ओर से गुरजना।” गुरुजी की यह बात सुनकर वह विद्यार्थी चल पड़े। जब वे लोग काशी से एक कोस की दूरी पर निकल गए तो एक विद्यार्थी ने कहा-“देखो! श्यामा चिड़िया बैठी है और कुछ बोल रही है।” सब विद्यार्थी उसके दाहिनी ओर को चले, तभी वह चिड़िया उड़ गयी। सब विद्यार्थी कुछ दूर तक उसके पीछे दौड़े फिर सब थककर बैठ गए। परन्तु कृष्णदत्त ने कहा-“मैं तो गुरुजी की आज्ञा नहीं टालूंगा, चाहे वह चिड़िया कितनी भी दूर क्यों न जाए, परन्तु मैं इसके दाहिने ही जाऊंगा।&#8221; यह विचार करके जिधर श्यामा चिड़िया उड़ी, उधर ही कृष्णदत्त भी चला। अचानक चिड़िया एक पेड़ पर बैठ गई और कृष्णदत्त उसके दाहिने से गुजर गया। इस प्रकार कृष्णदत्त भी शहर में पहुंच गया। उस समय रात हो चुकी थी। वह थका-हारा सेठ के मकान पर पहुंचा, मगर उस मकान का दरवाजा बन्द हो चुका था। वह सुबह से भूखा-प्यासा तो था ही, एक दुकान के तख्ते पर सो गया। ऐ तोते! उसी दिन शहर के राजा की बेटी जिसका नाम चन्द्रवती था। बारात दूसरे शहर से आई थी। परन्तु वह दूल्हा काना था। दूल्हे के पिता को चिंता थी कहीं मेरे काने बेटे को देखकर राजा अपनी बेटी का विवाह मेरे बेटे के साथ करने से इन्कार न कर दे। इससे बारात वापिस जाएगी और उसकी काफी बदनामी होगी, वह कहीं मुंह दिखाने के योग्य नहीं रहेगा। इससे उचित यह है कि किसी सुन्दर लड़के को बुलाकर उसे दुल्हे के कपड़े पहनाकर वेदी पर बैठा दें और जब फेरे पड़ जाएं तब उसे कुछ देकर विदा कर दें । इस प्रकार मेरे बेटे का विवाह हो जाएगा। यह विचार कर उसने अपने मंत्री से सलाह की। “यह तो आपने बहुत अच्छा उपाय सोचा है।&#8221; मन्त्री ने कहा। “यह भेद किसी पर प्रकट नहीं होना चाहिए। तुम शहर में जाकर किसी सुन्दर लड़के को पकड़कर ले आओ।” राजा ने मंत्री को समझाते हुए कहा। मंत्री शहर में आया और लड़का ढूंढ़ने लगा। एक दुकान के बाहर कृष्णदत्त को सोता देखकर उसे जगाया और कहा–“ऐ ब्राह्मण पुत्र! हमें तुमसे एक काम है, यदि तुम हमारा काम कर दो तो हम तुम्हें एक हजार अशर्फियां देंगे।&#8221; “क्या काम है?&#8217; कृष्णदत्त ने पूछा। आज रात हम तुम्हें दूल्हा बनाना चाहते हैं, यदि तुम्हें स्वीकार है तो जैसा हम कहें, वैसा ही करो। सुबह हम तुम्हें एक हजार अशर्फियां देकर विदा कर देंगे।&#8221; मंत्री ने उसे लालच देने वाले अंदाज में समझाया। “मुझे स्वीकार है।” कृष्णदत्त राजी हो गया। मंत्री उसे अपने साथ ले गया और उसको दूल्हा बना दिया गया। बड़ी खुशी से नाच-रंग होने लगा और खुशियां मनायी जाने लगीं। वहां हिन्दू समाज के मुताबिक रस्में होने लगीं और राजा ने अपनी बेटी के साथ कृष्णदत्त के फेरे डलवा दिए। जब फेरे पड़ चुके तो राजकुमारी और कृष्णदत्त सोने के कमरे में चले गए। ऐ तोते! उस समय कृष्णदत्त को विवाह का हर प्रकार से आनन्द तो प्राप्त हुआ, किन्तु कृष्णदत्त से उसके पेट की बात किसी ने नहीं पूछी कि तुमने कुछ खाया भी है या नहीं। वह बेचारा कल से भूखा था ही, जब राजकुमारी के साथ आनन्द करने बैठे तो भूख ने ऐसा सताया कि उसके प्राण निकलने लगे। अन्ततः विवश होकर कृष्णदत्त ने राजकुमारी से कहा—“राजकुमारी! मुझको इस समय भूख लग रही है, क्योंकि कल से मैंने कुछ नहीं खाया है।” “प्रियतम! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं, यदि तुम मुझसे कह देते तो मैं दासियों को बुलाकर खाना खिला देती। मगर अब तो रसोई घर बन्द हो चुका है। अब मैं क्या करूं?” राजकुमारी चिन्तित स्वर में बोली। “प्राण प्यारी! चाहे कुछ भी उपाय करो, मुझे भोजन कराओ वरना मेरे प्राण निकल जाएंगे।” “और तो कोई उपाय नहीं है, हां कल मेरी माता ने चावल से मेरी गोद भरी थी, वो सूखे चावल अभी तक रखे हैं।” राजकुमारी ने कहा। कृष्णदत्त बोला-“उन्हीं को ले आओ।&#8221; राजकुमारी वो चावल ले आई और अपनी पुरानी साड़ी जलाकर गंगाजल में उनको पकाया। कृष्णदत्त ने चावल खाकर पानी पिया, तब कहीं जाकर उसे आराम मिला। तत्पश्चात् राजकुमारी और कृष्णदत्त ने सुहागरात मनायी और तमाम रात ऐश से गजारी। जब सुबह हुई तो कृष्णदत्त को मंत्री ने एक हजार रुपये देकर विदा कर दिया। ऐ तोते! कृष्णदत्त तो काशी चला गया और लड़की को विदा करने की तैयारियां होने लगीं। तब राजा ने कुछ सोचकर अपने बेटे की आंख पर पट्टी बांध दी। जब वह ससुराल पहुंचा तो सब स्त्री-पुरुष उसको देखने लगे और कहने लगे कि, “रात तो दूल्हे की आंख सही-सलामत थी अब क्या हो गया?&#8221; तब दूल्हे के साथियों ने कहा-“आज सुबह से ही राजकुमार की आंख दुखनी आ गई है।&#8221; यह सुनकर चन्द्रावती भी उसे देखने लगी। उसने उसे देखकर पहचान लिया और मन ही मन कहने लगी यह व्यक्ति मेरा पति नहीं है। दाल में कुछ काला लगता है।  आप यह मतलब परस्त पति की कहानी लोकहिंदी पर पढ़ रहे है!  अब चन्द्रावती ने अपने पिता को बुलाया और हाथ जोड़कर बोली-“यह...</p>
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