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	<title>ESSAY IN HINDI &#8211; Lok Hindi</title>
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		<title>मुंशी प्रेमचंद : हिंदी में निबंध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[lokhindi]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Aug 2019 15:51:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मुंशी प्रेमचंद हिंदी में निबंध उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद पर आधारित सम्पूर्ण हिंदी में निबंध। Essay in Hindi based on the novel Samrat Munshi Premchand, प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के विश्व विख्यात लेखक थे। मुंशी प्रेमचन्द जी हिंदी में कहानी और उपन्यासों के लेखन के लिए एक नए मार्ग का निर्माण किया था। भूमिका: प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के विश्व विख्यात लेखक थे। मुंशी प्रेमचन्द जी हिंदी में कहानी और उपन्यासों के लेखन के लिए एक नए मार्ग का निर्माण किया था। इन्होंने हिंदी लेखन कार्यों में एक ऐसी नींव डाली थी। उसके बिना हिंदी के विकास का अध्यापन कार्य अधुरा होता है। प्रेमचंद को मुंशी प्रेमचंद के नाम से पहचाना जाता है जो कि एक सचेत नागरिक, संवेदनशील लेखक और सकुशल प्रवक्ता थे। हमारे हिंदी साहित्य को उन्नत बनाने के लिए अनेक लेखकों ने अपना योगदान दिया है। हर लेखक का अपना महत्व होता है परन्तु मुंशी प्रेमचंद जैसा लेखक किसी देश को बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है। अगर उन्हें भारत का गोर्की कहा जाये तो इसमें कुछ गलत नहीं है। मुंशी प्रेमचंद जी के लोक जीवन का व्यापक चित्रण और सामाजिक समस्याओं के गहन अध्ययन को देखकर कहा जा सकता हैं कि मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में भारतीय जीवन के मुंह बोलते हुए चित्र देखने प्राप्त होते हैं। प्रिय लेखक: मुंशी प्रेमचंद जी हम सबके सबसे प्रिय लेखक हैं। मुंशी प्रेमचंद ने एक दर्जन उच्चकोटि के उपन्यासों को लिखा हैं और तीन सौ से भी अधिक कहानियाँ रचकर हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाया है। मुंशी प्रेमचन्द जी के उपन्यासों में कर्म भूमि, गोदान और सेवासदन आदि प्रसिद्ध हैं। उनकि कहानियों में कफन और पूस की रात अत्यधिक मार्मिक हैं। मुंशी प्रेमचन्द जी कि कहानियाँ जन जीवन का मुंह बोलता हुआ चित्रण प्रस्तुत करती हैं। प्रिय लगने का कारण: मुंशी प्रेमचंद जी साहित्य में अशलीलता और नग्नता के कट्टर विरोधी थे। मुंशी प्रेमचंद का मानना है कि साहित्य समाज का आयना है जो उसका ही चित्रण करता है परन्तु साथ ही साथ समाज के आगे एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करता है जिससे लोग अपने साहित्य समाज के सामने अपना चरित्र ऊँचा उठा सकते हैं। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों के अनेक पात्र धनिया, होरी, सोफी, जालपा, निर्मला आदि सभी आज भी जीते जागते पात्र ही महसुस होते हैं। गरीबों का जीवन लिखने पर उन्हें विशेष सफलता प्राप्त हुई है। प्रेमचंद जी की भाषा अत्यधिक सरल है परन्तु मुहावरो का भी प्रयोग किया गया है। भारत में हिंदी का प्रचार-प्रसार करने में मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों ने अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुंशी प्रेमचंद ने ऐसी भाषा का अपने लेखन में प्रयोग किया जिसे लोग आसानी से समझते और जानते थे। इसी कारण से मुंशी प्रेमचंद जी के अन्य लेखकों की तुलना में अधिक उपन्यास बिके थे। मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय परिचय : बचपन का नाम &#8211; धनपत राय श्रीवास्तव,  नाम से प्रसिद्ध हुए &#8211; मुंशी प्रेमचंद  जन्म – 31 जुलाई, 1880, लम्ही, उत्तर पश्चिम, ब्रिटिश भारत पिता – अजीब लाल माता – आनंद देवी व्यवसाय –  लेखक और उपन्यासकार भाषा – हिंदी और उर्दू राष्ट्रीयता – भारतीय प्रसिद्ध लेख – गोदान, बाज़ार-ए-हुस्न, कर्मभूमि, शतरंज के खिलाडी, गबन पत्नी- शिवरानी देवी बच्चों के नाम – श्रीपत राय, अमृत राय, कमला देवी मृत्यु – 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की आयु में वाराणसी, बनारस स्टेट, ब्रिटिश भारत।   मुंशी प्रेमचन्द जी को भारत का उपन्यास सम्राट माना जाता हैं जिनके युग का कालखण्ड सन् 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व रखता है। इस युगकाल में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम कई महत्वपूर्ण स्तरों से गुजरा है। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे एक सफल लेखक, कुशल वक्ता, जिम्मेदार संपादक एवं संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में कार्य करने की तकनीकी व्यवस्था नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक मुंशी प्रेमचंद जी अलावा कोई दूसरा नहीं हुआ।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में प्रारंभिक जीवन: मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31जुलाई, 1880 को वनारस के पास एक गाँव लम्ही में, औपनिवेशिक भारत के टाईम हुआ था। उनके फादर अजीब राय, पोस्ट ऑफिस में एक क्लर्क का कार्य करते थे और उनकी माता आनंदी देवी एक गृहणी थी। प्रेमचंद जी के माता &#8211; पिता के चार संतान थी। मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मदरसा, लालपुर में उर्दू और फारसी शिक्षा के रूप में ग्रहण की। उसके बाद मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी अंग्रेज़ी की पढाई एक मिशन स्कूल से पूर्ण किया। जब मुंशी प्रेमचंद कि आयु आठ वर्ष थी तब उनकी माता जी मृत्यु हो गयी थी। उनके पिताजी ने दूसरी शादी भी की थी। मुंशी प्रेमचंद अपने सौतेली माँ से अच्छे से घुल मिल नहीं पाये थे और ज्यादातर समय वो दुखी और तन्हाई में गुजारा करते थे। वे अकेलापन दुर करने के लिए वो अपना समय किताबे पढने में लगाया करते थे और ऐसा करते-करते वे किताबों के शौक़ीन बन गए। सन् 1897 में उनके फादर की मृत्यु हो गयी और उसके बाद मुंशी प्रेमचंद ने अपनी पढाई छोड़ दी। मुंशी प्रेमचंद जन्म और विवाह: मुशीं प्रेमचंद का जन्म वाराणसी से लगभग चार मील दूर, लमही नामक एक गांव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ था। प्रेमचंद के पिताजी का नाम मुंशी अजायब लाल और माताजी का नाम आनन्दी देवी थी। मुंशी प्रेमचंद का बचपन गांव में बीता था। मुंशी प्रेमचंद जी का कुल दरिद्र कायस्थों का था, जिनके पास लगभग छ: बीघा जमीन थी और जिनका परिवार काफी बड़ा था। प्रेमचंद के दादा जी, मुंशी गुरुसहाय लाल, पटवारी का कार्य करते थे। उनके पिता, मुंशी अजायब लाल, डाकमुंशी का कार्य करते थे और उनका वेतन लगभग पच्चीस रुपए महिना था। उनकी मां आनन्द देवी सुन्दर, सुशील और गुणवान महिला थीं। जब मुंशी प्रेमचंद आयु पंद्रह वर्ष थी, उस समय उनका विवाह हो गया। वह विवाह उनके सौतेले नाना ने करवाया था। सन् 1905 के अंतिम दिनों में मुंशी प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से शादी कर ली थी। शिवरानी देवी बाल-विधवा थीं। यह कहा जाता है कि दूसरी शादी के पश्चात् इनके जीवन में परिस्थितियां में कुछ बदलाव आया और आर्थिक तंगी में कमी हुई। इनके लेखन कार्य में अधिक सजगता आने लगी ।...</p>
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		<title>बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ &#8211; हिंदी निबंध</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Aug 2019 13:32:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान पर हिंदी निबंध &#124; Beti Bachao Beti Padhao Essay beti bachao beti padhao essay in hindi, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान पर हिंदी निबंध &#8211; प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को बेटियों कि हालात को सुधारने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान/योजना की शुरुवात की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य है की…  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ भूमिका: दोस्तों आज हम बात करेगे &#8220;बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान&#8221; की हमें जरुरत क्यों पड़ी, ऐसा क्या हुआ होगा कि भारत जैसे पुरातन संस्कृति और धर्मपरायण विचारों वाले राज्य को बेटियों को बचाने के लिए और उनको पढ़ाने के लिए एक अलग मुहिम चलानी पड़ी सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि लोगों की मानसिकता बहुत संकुचित हो गई है,  उनका बेटियों के प्रति रवैया बहुत ही घटिया स्तर का हो गया है और सोचने की बात तो यह है कि उन्हें ऐसा कृत्य करते हुए जरा भी शर्म महसुस नहीं होती है। ऐसी छोटी व संकुचित सोच रखने वाले लोग बेटी और बेटो में भेदभाव करते हैं क्योंकि वह सोचते हैं कि बेटे हमारी पूरी जिंदगी भर सेवा करेंगे और बेटियां तो पराया धन होती हैं उनको पढ़ा लिखा कर क्या फायदा होगा, इसलिए वह बेटों को ज्यादा अच्छी शिक्षा दिलाते हैं और उन्हीं का ज्यादा ध्यान रखते हैं। वर्तमान में उन लोगों की सोच इतनी निच्चे स्तर तक गिर गई है कि वे लोग बेटियों को अब जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार देते हैं और अगर गलती से उनका जन्म भी हो जाता है तो उनको इसी सुनसान स्थान पर फेंक आते हैं।   हमारी सरकार ने इसके विरुद भी कन्या भूण हत्या को रोकने के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं लेकिन उनका पालन अच्छी तरह से नहीं होने के कारण मनावान्छित लाभ नही मिल रहा है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा इसलिए दिया गया क्योंकि भारत में दिन-प्रतिदिन बेटियों की स्थिति खराब होती जा रही हैं, उनके साथ उन्हीं के जन्मदाता भेदभाव कर रहे हैं। वह सोचते हैं कि बेटियां तो पराई-धन होती हैं उनकी कैसे भी जल्दी से जल्दी शादी करा दो और उनको पढ़ाने-लिखाने का कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए वे केवल बेटों पर ज्यादा ध्यान देते हैं उनकी अच्छी शिक्षा कि उचित व्यवस्था करते हैं और बेटियों को स्कूल में पढ़ने तक का अवसर नहीं देते हैं। बेटियों के इस बिगड़ते हुए हालात को देखते हुए भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को बेटियों कि खसता हालात को सुधारने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान/योजना की शुरुवात कि। इस योजना का मुख्य उद्देश्य है कि बेटियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव ना हो व उन्हें भी लङकों के बराबर अधिकार प्रात हो ओर गांव-गांव जाकर इसका प्रचार प्रसार करना था। हमारा भारत देश पौराणिक संस्कृति के साथ-साथ महिलाओं के सम्मान और इज्जत के लिए भी पहचाना जाता था।  लेकिन बदलते समय के साथ-साथ हमारे देश के लोगों की सोच में भी बदलाव आ गया है। जिसके कारण अब बेटियों और महिलाओं के साथ हैं एक समान व्यवहार नहीं किया जाता है। लोगों की सोच किस कदर परिवर्तित हो गई है कि आए दिन देश में कन्या भ्रूण हत्या और बलात्कार जैसे अनेक मामले सामने आते रहते हैं। जिसके कारण हमारे देश की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि दूसरे देश के लोग हमारे भारत देश में आने से कतराते हैं। हमारे देश के लोगों ने मिलकर हमारे देश में पुरुष प्रधान समाज कि नीति को अपना लिया है जिसके कारण देश की बेटियों के हालात अत्यधिक गंभीर रूप से खराब हो गए हैं।  उनके साथ हर समय लैंगिग भेदभाव किया जा रहा है और ना ही उन्हें उचित शिक्षा प्रदान कि जा रही है। जिसके कारण वे हर क्षेत्र में पिछड़ रही है। उनकी आवाज को हर बार इस कदर दबा दिया जाता रहा है कि उन्हें घर से बाहर जाने तक की आजादी तक नहीं दी जाती है। इस मुद्दे कि गंभीरता को देखकर हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक नई योजना का प्रारंभ किया जिसका नाम &#8220;बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (Beti Bachao Beti Padhao)&#8221; रखा गया। इस योजना के द्वारा बेटियों की शिक्षा के लिए उचित व्यवस्था की जा रही है और लोगों की सोच में परिवर्तन लाने के लिए जगह-जगह इसका प्रचार प्रसार किया जा रहा है जिससे लोग बेटी और बेटियों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करें। 21वी शताब्दी में भारत आज जहां एक और चांद पर जाने के कदम बढा हैं वहीं दूसरी तरफ भारत की बेटियां अपने घर से बाहर निकलने पर भी डर रही हैं। जिससे यह पता लगता है कि आज भी भारत देश पुरुष प्रधान समाज वाला देश है। हमारे देश के लोगों की मानसिकता इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि वह महिलाओं और बेटियों का सम्मान नहीं करते हैं। स्वामी विवेकानंद जी के एक कथन के अनुसार &#8220;जिस देश में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वह देश कभी भी प्रगति नहीं कर सकता है।&#8220; हमारे देश के लोगों पर दकियानूसी सोच इतनी हावी हो गई है कि वे लोग अब बेटी और बेटियों में फर्क करते हैं। वह बेटों को उचित शिक्षा दिलाते हैं और बेटियों को घर पर ही रहकर घर के काम सीखने को कहते हैं उन्हें किसी भी प्रकार की आजादी प्रदान नहीं कि जाती है। जिसके कारण बेटियों का भविष्य अंधकार में चला गया है। हमारे देश की बेटियां आज भी अपने घर से निकलने पर भी कतराती हैं क्योंकि कुछ लोगों ने देश का माहौल इतना खराब कर दिया है कि आए दिन हम देखते हैं कि किसी ने किसी की बहन बेटी से बलात्कार की या छेड़छाड़ की घटनाएं आम रुप से देखने को मिलती है।  यह घटनाएं हमारे देश के लोगों की सोच को दर्शाती हैं कि उनकी सोच कितनी हद तक गिर चुकी है और इस बात कि ना तो उन्हें शर्म आती है ना ही उन्हें किसी प्रकार का पछतावा होता है। हमारे देश में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही कन्या भ्रूण हत्या भी लोगों की संकुतित मानसिकता का परिचय देती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत को चेतावनी...</p>
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		<title>स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध &#8211; Essay in Hindi</title>
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		<dc:creator><![CDATA[lokhindi]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Aug 2019 20:52:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध  Swachh Bharat abhiyan essay in Hindi, स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध हिंदी में &#8211; स्वच्छता कि ओर एक कदम। स्वच्छता पर आधारित सम्पूर्ण हिंदी निबंध परीक्षा तैयारियों और विध्याथियो के लिए Swachh Bharat mission essay Hindi भारतवर्ष जो कभी किसी जमाने में सोने की चिड़िया कहलाता था, जो कि अपने वैभव और संस्कृति के लिए जाना जाता था। उस समय भारत में हर तरह की सुविधा उपलब्ध थी और उस समय हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आता था। लेकिन समयचक्र के बदलाव के चलते हमारे देश पर कई विदेशी ताकतों ने अपना सम्राज्य स्थापित किया जिससे हमारी देश की हालत खराब हो गई। हमारे देश में स्वच्छता पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता है। आपने देखा होगा कि हमारे देश का कोई भी बड़ा राज्य हो या शहर हो या फिर गांव हो या फिर कोई गली या मोहल्ला हो वहां पर भी आपको कूड़ा-करकट मिलेगा। जिसके कारण हमारे देश में अनेक बीमारियां फैल रही हैं और साथ ही हम हमारी जिंदगी गंदगी में जीने को मजबूर हैं। अब तो ऐसा लगता है मानो गंदगी हमारे जीवन का एक भाग हो गया है। हमारे देश के विकास में रोङा बनने वाली समस्याओं में एक मुख्य कारण गंदगी भी है, क्योंकि इसके कारण विदेशी लोग हमारे देश में आना पसंद नहीं करते हैं और जिससे हमारे देश को इतनी ख्याति नहीं मिलती है।   राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का सपना: हमारे पूजनीय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वतंत्रता से पहले स्वच्छ रहना और इसके तहत स्वच्छता को उन्होंने ईश्वर भक्ति के बराबर माना, स्वच्छता की शिक्षा को उन्होंने सभी को प्रदान करी उनका सपना था कि (स्वच्छ भारत) इसके तहत वह सभी नागरिकों को एक साथ मिलकर भारत को साफ रखने के बारे में सोचते थे इसी के तहत जिस आश्रम में वो रहते थे। वहां रोजाना प्रात: 4:00 बजे उठकर स्वयं सफाई करते थे। उन्होंने वर्धा आश्रम में अपना स्वयं का शौचालय बनवाया था जिसको प्रतिदिन शुबह – शाम साफ भी करते थे। गांधी जी की यही स्वच्छ भारत अभियान को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करी। स्वच्छ भारत अभियान को सरकार द्वारा देश की स्वच्छता के प्रतीक के रूप में शुरू किया गया है। स्वच्छ भारत का सपना महात्मा गाँधी जी ने देखा था। अपने सपने के संदर्भ में गाँधी ने कहा कि स्वच्छता स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी है और स्वच्छता ही स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन का एक अनिवार्य भाग है। महात्मा गाँधी जी अपने समय में देश की गरीबी और गंदगी से अच्छी तरह अवगत थे, इसीलिए उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए बहुत से प्रयास किये लेकिन वो अपने प्रयासों में सफल न हो सके। स्वच्छ भारत अभियान हमारे देश को स्वच्छ करने के उद्देश्य से चलाया गया है। इस अभियान से हमारा देश साफ सुथरा होने के साथ-साथ देश के आर्थिक विकास को भी सहारा मिलेगा हर तरफ खुशहाली होगी। इस अभियान को 2 अक्टूबर 2014 को माननीय प्रधानमंत्री ने दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती में सफाई करके इसका उद्घाटन किया था। इस अभियान के अंतर्गत भारत देश के सभी शहरों ग्रामीण इलाकों मोहल्लों और गलियों में साफ सफाई करना है। स्वच्छ भारत अभियान में प्रमुख रुप से खुले में शौच मुक्त भारत बनाने पर जोर दिया गया है क्योंकि आज भी हमारे गांव में अधिकतर घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है जिसके कारण लोग बाहर शौच करने जाते हैं। जिससे वातावरण प्रदूषित होता है और साथ ही नई बीमारियां भी जन्म लेती हैं। इस अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने सभी लोगों से निवेदन किया कि वे अपने आस-पास की और दूसरी जगहों की सफाई के लिए साल में केवल 100 घंटों के लिए अपना योगदान दे। स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत: भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने महात्मा गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की , स्वच्छ भारत अभियान को भारत मिशन और स्वच्छता अभियान भी कहा जाता है ।महात्मा गांधी जयंती के अवसर पर माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी महात्मा गांधी जी की 145 वी जयंती के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत की 2 अक्टूबर 2014 को उन्होंने राजपथ पर जनसमूहों को संबोधित करते हुए राष्ट्रवादीओं से स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने को कहा साफ-सफाई के संदर्भ में यह सबसे बड़ा अभियान है। साफ-सफाई को लेकर भारत की स्थापित छवि को बदलने के लिए श्री नरेंद्र मोदी जी ने देश को एक मुहिम से जोड़ने के लिए जन आंदोलन के रूप में इसकी शुरुआत की । भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस अभियान को पूरा करने के लिए 5 साल का लक्ष्य रखा था और उन्होंने कहा था कि महात्मा गांधी जी के 150 वीं जयंती तक पूरे भारत को स्वच्छ करने का लक्ष्य रखा है। इसमें उन्होंने प्रत्येक भारतवासी से आग्रह किया था कि वे इस अभियान से जुड़ें और अपने आसपास के क्षेत्रों की साफ-सफाई करें। इस अभियान को सफल बनाने के लिए उन्होंने देश के 11 महत्वपूर्ण एवं प्रभावी लोगों कोई इसका प्रचार प्रसार करने के लिए चुना है। जिनमें कुछ क्रिकेटर, कुछ फिल्मकार, और कुछ महान लोग हैं, जिनको लोग सुनना पसंद करते हैं और उनकी बातों पर अमल भी करते हैं। मोदी जी ने कहा था कि हर एक व्यक्ति को इस अभियान में 9 लोगों को जोड़ना है और फिर वह दूसरा व्यक्ति भी 9 लोगों को जोड़ेगा इससे अभियान का प्रचार प्रसार भी होगा और लोगों में उत्साह भी होगा कि अपने आसपास सफाई रखनी आवश्यक है। इस अभियान को सफल बनाने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी और देश के गणमान्य लोगों ने सड़कों पर साफ सफाई की थी। इसको देखकर लोगों में साफ सफाई के प्रति नया उत्साह पैदा हो गया और लोगों ने साफ सफाई भी करना चालू कर दिया है। स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य है कि 2019 तक पूरा भारत स्वच्छ एवं साफ सुथरा हो। स्वच्छ भारत अभियान से हमारा देश केवल स्वच्छ ही नहीं होगा इससे देश में हर तरफ खुशहाली आएगी और लोग खुश रहेंगे। क्योंकि अगर हमारे आसपास की जगह साफ...</p>
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		<title>भारत में जल संकट निबंध &#8211; Water Crisis in India</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Aug 2019 15:13:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>भारत में जल संकट निबंध Water Crisis in India Essay in Hindi / भारत में जल संकट: अस्तित्व और विकास पर प्रश्न चिह्न पर आधारित हिंदी में निबंध (भारत में जल संकट पर हिंदी में निबंध) भूमिका &#8211; भारत में जल संकट: पृथ्वी के अस्तित्व के पाँच घटकों- क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर में जल का स्थान प्राणियों के अस्तित्व और विकास दोनों में उत्कृष्ट है। ऋग्वेद कहता है- &#8216;तो आपो देवीरिह मामवंत&#8217; अर्थात् जल हमारी रक्षा करे। ‘महाभारत’ में व्यास नदियों को ‘विश्वस्य मातर&#8217; अर्थात् लोकमाताओं के रूप में याद करते हैं। ऋषि कहता है- यज्ञों से स्वर्ग मिलता है। किंतु मंदिरों, तालाबों और वाटिकाओं के निर्माण से संसार से मुक्ति मिलती है। इस प्रकार मानव चेतना में हज़ारों वर्षों से जल तत्व की प्रतिष्ठा रही है किंतु विज्ञान-चेतना से संपन्न आधुनिक मनुष्य ने जल के अति दोहन एवं प्रदूषण ने जल का जो मानवकृत संकट उपस्थित किया है वह किसी भी तरह सामूहिक आत्मघात से कम नहीं है। भारत में जनसंख्या का बढ़ता दबाव सर्वाधिक है इसलिए इस आत्मघात से बचने की चुनौती सबसे पहले भारत के सामने है। भारत में जल संकट का स्वरूप: यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार 97.2 प्रतिशत जल समुद्रों के ) रूप में है तथा मात्र 0.6 प्रतिशत भूमिगत (95 प्रतिशत) एवं धरातल पर (5 प्रतिशत मूदु जल के रूप में उपलब्ध है। भारत में 1869 घन किलोमीटर जल उपलब्ध है तथा प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष 610 घन मीटर उपभोग करता है जोकि विकसित देशों की तुलना में काफ़ी कम है किंतु जनसंख्या दबाव की वजह से एवं राजस्थान जैसे जल शुष्क प्रदेशों में यह उपभोग 300 घन मीटर से भी कम है जिससे जल के अभाव एवं प्रदूषण के कारण विकास एवं स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिक शोध संस्थान के शोध-सर्वेक्षण के अनुसार देश में उपलब्ध जल राशि का 70 प्रतिशत भाग अपेय है, दूषित जल से प्रतिवर्ष 700 करोड़ रुपये से भी अधिक हानि होती है। राजस्थान में भू-जल का दोहन भू-जल भंडार में आवक से 150 प्रतिशत अधिक किया जा रहा है, अल्पवृष्टि के परिणामस्वरूप सभी 33 ज़िलों में भू-जल स्तर प्रतिवर्ष 5 से 10 फुट की दर से नीचे गिरता जा रहा है । राजस्थान भारत की 13 प्रतिशत भू-भागवाला प्रदेश होकर भी देश का एक प्रतिशत जल ही प्राप्त किए हुए है। 237 खंडों में से 109 खंड डार्क जोन में आ चुके हैं। इस प्रकार राजस्थान में तो जल की उपलब्धता, संरक्षण एवं स्वच्छता तीनों ही भयंकर संकट से गुज़र रहे हैं। भारत में 1947 में प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति जल उपलब्धता 6008 घन मीटर थी । जो 2008 में 2000 घन मीटर से भी कम रह गई है। यह जनसंख्या-वृद्धि एवं जल-भंडार में कमी दोनो कारणों से हुई है। जल उपलब्धता की विषमता इस कदर है कि राजस्थान, गुजरात, आंध्रप्रदेश आदि प्रदेशों में कई क्षेत्रों में 500 घन मीटर से भी कम है ।जल-स्वच्छता की दृष्टि से भारत विश्व में 120वें स्थान पर होना तथा केवल 42 प्रतिशत लोगों को ही स्वच्छ पानी उपलब्ध होग (वल्र्ड वाच संस्थान) हमारे जल-प्रदूषण की विडंबना का आत्मघाती प्रमाण है। भारत में जल संकट के कारण: भारत में जल-संकट के पीछ एक ओर आज़ादी के बाद जनसंख्या में तीन गुना वृषि तथा प्रति व्यक्ति जल उपभोग में वृद्धि तो है ही लेकिन दूसरी ओर सिंचित कृषि-क्षेत्र का निरंतर होता विस्तार और विशेष रूप से खेतों में नालियों के माध्यम सिंचाई करने की वह पारंपरिक प्रणाली है जिसमें 60 प्रतिशत पानी वाष्प के रूप में उड़ जाता है । यद्यपि पिछले दो दशकों में मौसम का मिजाज़ तेजी से बदल रहा है तथा सूखा एक प्राकृतिक आपदा बनता जा रहा है किंतु जल संकट की इस बिकरालता के लिए मानव गतिविधियाँ अधिक ज़िम्मेदार हैं। अगर हड़प्पाकालीन मनुष्य धौलावीरा (कच्छ का रण) में पत्थर का बाँध बनाकर हजारों वर्ष पहले जामनगर से जूनागढ़ तक खानाबदोश मालधारी ‘विरडा&#8217; पद्धति द्वारा तथा दुनिया के न्यूनतम वृष्टि-स्थल जैसलमेर में सर, कुंड आदि के द्वारा जल &#8211; संरक्षण कर सकता है तो आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के युग में जल-समस्या को निरंतर बढ़ाते जाना हमारी सरकार एवं समाज के विवेक एवं संकल्प पर प्रश्न-चिहन खड़े करता है । वस्तुत हम पारंपरिक जल प्रणालियों को बराबर नष्ट करते जा रहे हैं । राजस्थान के झुंझुनू ज़िले में 150 से अधिक जोहड़ (छोटे तालाब) सूखे हैं, बीकानेर के तालाब लगभग सूख चुके हैं, हज़ारों बावड़ियाँ, झालरें, नदियाँ, नाड़े, कुंड निर्जल हो चुके हैं । वस्तुतः हम समाज की उस मूल्यवत्ता और सामाजिक आचार-संहिता को नष्ट करते जा रहे हैं जो हमें सामुदायिक अस्तित्व को प्रकृति के साथ दीर्घकाल तक जोड़ रखने का स्रोत और कौशल देती है। परंपरागत जल-संरक्षण की संपन्नता का मुख्य आधार जल का विवेकपूर्ण उपयोग तथा भू-जल दोहन के साथ-साथ उनका पुनर्भरण का चिंतन रहा है। इसीलिए पश्चिमी राजस्थान जैसे मरु प्रदेश में हज़ारों वर्षों से चली आ रही बस्तियों ने जल-संरक्षण की कम ख़र्चींली, उपयोगी एवं टिकाऊ संरचनाओं जबकि अब आधुनिक तकनीकी मनुष्य ने राजस्थान नहर के तल को जो इतना छिद्रयुक्त बनाया है वह जल-अपव्यय एवं ‘सेम समस्या का ही शर्मनाक उदाहरण नहीं है बल्कि यह आधुनिक भारतीय प्रशासन के मूल्य-क्षरित तल में वह छेद है जो उसे निरंतर ‘पानी-रहित&#8217; बनाता जा रहा है। भारत में जल-संकट के निवारण के उपाय: पर्याप्त जल की उपलब्धता मनुष्य के अस्तित्व एवं सुविधापूर्वक जीवन जीने के मानव अधिकार एवं मूल अधिकार से जुड़ा प्रश्न है इसलिए हम पानी को अपने हिस्से की जायदाद मानकर अन्य लोगों के इन आधारभूत अधिकारों का हनन नहीं कर सकते इसलिए जल-संकट से उबरने के उपायों में प्रमुख तो पूरे समाज में इस चेतना का प्रसारण करना है। जल एक समाज-संपदा है इसलिए इसकी उपलब्धता, संरक्षण और उपयोग में वैयक्तिक सुविधा के साथ-साथ सामाजिक बोध आवश्यक है। जल उपलब्धता के लिए हमें गहन वृक्षारोपण एवं परंपरागत जल-संरचनाओं के निर्माण में केवल सरकार पर निर्भर न रहकर, सामुदायिक सहभागिता से बावड़ी, सर, झालरा, नाड़ी, कुंड आदि का निर्माण-पुनर्निर्माण करना होगा, देश-प्रदेश के नदी-तालाबों के भू-स्तरीय जल का समान वितरण करना होगा जिसमें देश में नदियों के परस्पर जोड़ने की योजना महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः जल-संरक्षण में ही हमारे समाज की परपरागत जल-प्रबंधन के उद्देश्यों एवं दर्शन की चेतना जाग्रत कर...</p>
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		<title>Global Warming Essay in Hindi</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Aug 2019 20:43:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ESSAY IN HINDI]]></category>
		<category><![CDATA[Global Warming]]></category>
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		<category><![CDATA[ग्लोबल वार्मिंग पर हिंदी में निबंध]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>Global Warming Essay Global Warming Essay in Hindi / ग्लोबल वार्मिंग (धरती के ताप का बढ़ना) की बढ़ती गर्माहट पर आधारित हिंदी में निबंध (ग्लोबल वार्मिंग पर हिंदी में निबंध) ग्लोबल वार्मिग (Global Warming) के कारण 21वीं शताब्दी में लू चलने, विनाशकारी मौसम और उष्णकटिबंधीय बीमारियों में बढ़ोतरी के कारण अनेक लोग मृत्यु की चपेट में आएंगे । मलेरिया का विस्तार ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बनकर उभरेगा।’’ क्योटो शिखर सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय चिकित्सक। भूमिका : ग्लोबल वार्मिग: वसुधा के अस्तित्व का संकट- ग्लोबल वार्मिग (Global Warming) (धरती के ताप का बढ़ना) पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक एवं चिंतनीय विषय है। वैज्ञानिकों एवं समाजशास्त्रियों ने अपने नवीनतम अध्ययनों में पाया है कि ग्रीन हाउस गैसों के ताबड़तोड़ उत्सर्जन पर प्रभावी रोक नहीं लगा पाने के कारण ग्लोबल वार्मिंग की विश्वव्यापी समस्या और गंभीर होने लगी है और इससे नई बीमारियों और अन्य पर्यावरणीय संकट के फैलने का संकट बढ़ गया है ।वस्तुतः आज संपूर्ण विश्व के सामने अन्यान्य आर्थिक-राजनीतिक पेचीदगियों से अधिक बड़ा संकट ग्लोबल वार्मिंग का पर्यावरणीय संकट बनने जा रहा है। समुद्री सतह में वृद्धि हो रही है, बाढ़ व सूखे की आशंका बढ़ रही है, खाद्यान्न में गिरावट आ रही है तथा प्रति 10 वर्ष में लगभग 2.43 डिग्री सेल्सियस की वृधि वसुधा के अस्तित्व को ही लीलने का कारण बनी हुई है। ग्लोबल वार्मिग का अर्थ और कारण- जहाँ एक ओर विश्व में उच्च तकनीकी औद्योगिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं जो मनुष्य के विकास की सूचक हैं, वहीं दूसरी ओर ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming)की गर्माहट भी बढ़ रही है जो भावी मानवता के लिए भयानक सिद्ध हो सकती है। विश्वभर के पर्यावरणविद लंबे अर्से से चिंतित हैं कि कार्बन डाइ ऑक्साइड तथा फ्लोरो कार्बन समूह की गैसों के निरंतर उत्सर्जन से, ग्रीन हाउस प्रभाव के चलते, दिनों-दिन धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी के वायुमंडल में अनगिनत गैसों के घनत्व प्रक्रियात्मक रूप से बनते रहते हैं। इन गैसों में कार्बन डाइ ऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन तथा जलवाष्प आदि होते हैं। सूर्य की किरणें, ओज़ोन मंडल में बिछी ओजोन पटिका से छनकर पैराबैंगनी किरणों से मुक्त होकर आती हैं। पृथ्वी पर फैले संसाधनों को इस प्रकार आवश्यक ऊष्मा मिलती है तथा पृथ्वी से अनावश्यक ऊष्मा का पलायन भी इसी प्राकृतिक कार्य का महत्वपूर्ण भाग है। ग्रीन हाउस गैस के असंतुलित होने के कारण पृथ्वी की गर्मी बाहर नहीं जा पाती और इस प्रकार विश्वव्यापी तापमान में वृब्धि होती है। ग्लोबल वार्मिग (Global Warming) का दुष्प्रभाव- पृथ्वी पर बढ़ते तापमान से अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि के अलावा समुद्र की जल-राशि बढ़ने लगती है । बर्फ का पिघलना और समुद्र के जल-स्तर का ऊपर आना पृथ्वी के जलमग्न हो जाने की संभावना को बढ़ाता है। पिछले सौ वर्षों से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो सन् 2100 तक समुद्र का जलस्तर में एक मीटर तक वृधि हो सकती है । वस्तुतः विश्व के पर्वतों की बर्फ की परत में निरन्तर ह्रास हो रहा है। अंटार्कटिका का 3 हजार वर्ग किमी. का हिमखंड टूटकर बिखर चुका है । जल-स्तर के बढ़ने के फलस्वरूप मालद्वीप के सन् 2025 तक सागर में समा जाने की आशंका है। विश्व के वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार लू चलने, विनाशकारी मौसम, ऊष्ण कटिबंधीय बीमारियों में बढ़ोतरी होने से अनेक लोग मृत्यु की चपेट में आ रहे हैं। और यूरोप व अमेरिका में 2003 की गर्मियों में जो असाधारण तापमान में वृद्धधि हुई है उससे हज़ारों लोग गर्मी से काल के ग्रास बने हैं । मलेरिया और डेंगू रोगों का विस्तार हो रहा है। वैज्ञानिकों का यह भी निष्कर्ष है कि वायुमंडल में तापमान वृब्धि के कारण पृथ्वी की अपनी धुरी पर घूमने की रफ्तार भी कम होती जा रही है। ग्लोबल वार्मिग (Global Warming) के लिए जिम्मेदार देश- ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के लिए मुख्य रूप से कार्बन डाई ऑक्साइड की वृधि ही जिम्मेदार है। इसके अलावा मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड भी इसी प्रकार की गैसें हैं जो वातावरण की ऊष्मा को सोख लेती हैं। वाहन तथा अन्य स्थानों पर जलनेवाले ईंधन तथा उद्योगों द्वारा उत्सर्जित ये गैसें ग्लोबल वार्मिंग को ही बढ़ाती हैं । पर्यावरणविदों का मानना है कि पर्यावरण असंतुलित करने में 50 प्रतिशत वायु प्रदूषण जिम्मेदार है जो मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है। ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में विकासशील देशों की तुलना में विकसित देश अधिक जिम्मेदार हैं। अमेरिका, जहाँ विश्व की कुल आबादी के केवल 4 प्रतिशत लोग रहते हैं, वहाँ से हर साल समूचे वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का 25 प्रतिशत भाग धुएँ के रूप में धकेला जा रहा है । विकसित यूरोपीय देश और अमेरिका मिलकर संपूर्ण विश्व का 50 प्रतिशत वायु प्रदूषण उत्पन्न कर रहे हैं । इस प्रकार ग्लोबल वार्मिंग मुख्यतया विकासशील देशों द्वारा अपनाई गई तकनीकों का दुष्परिणाम है। स्लोबल वार्मिग को नियंत्रित करने के लिए किए गए प्रयत्न- सन् 1959 में अमरीका के वैज्ञानिक प्लास ने कार्बन डाई ऑक्साइड व क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सीएफसी) गैसों के पर्यावरण पर पड़ते असर को एक बार फिर रेखांकित किया लेकिन ठोस आंकड़ों का अभाव बताकर विकसित देशों ने स्थिति की गंभीरता स्वीकारना उचित नहीं समझा । यह समस्या सन् 1974 में कार्बन डाई ऑक्साइड व तापमान वृदधि के संबंधों को दर्शाते हुए कंप्यूटर मॉडलों व तत्संबंधी अनुसंधानों के जरिए सुलझा ली गई और तब कही जाकर सचेत हुए वर्ष बाद और उसके पाँच 1979 में जिनेवा प्रथम विश्व जलवायु सम्मेलन में समस्या की गंभीरता समझी गई। इसके बाद 1980 में ऑस्ट्रिया में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम व विश्व मौसम विज्ञान संगठन की बैठक में जलवायु परिवर्तन को एक अंतरराष्ट्रीय समस्या के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई, हालाँकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी और धरती की ओजोन परत ने छीजना शुरू कर दिया था। सन् 1985 में वियना कन्वेंशन, 1987 में मांट्रियल प्रोटोकॉल 1988 में टोरंटो सम्मेलन&#8221; 1990 में द्वितीय विश्व जलवायु सम्मेलन, 1992 में रिओदिन जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन से लेकर 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल सरीखे अनेक आयोजन पर्यावरण को बचाए रखने के सिलसिले में हो चुके हैं । क्योटो समझौते के तहत ग्रीन हाउस गैसों के विस्तार में सन् 2008 से 2012 के बीच यूरोपीय संघ को...</p>
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